Thursday, 4 February 2016

आजकल कई युवाओ को देखता हूँ कि जरा सी भी विपरीत परिस्थितिया आने पर वो विचलित हो जाते है और उस समय क्या करे और क्या ना करे यह समझ नही पाते है, क्या कभी जानने की कोशिश की है कि ऐसा क्यों हो रहा है. इसके पीछे सबसे प्रमुख कारण अगर है तो वो है सयुंक्त परिवारो का ख़त्म होना और एकल परिवारो का प्रचलन बढ़ना. ये सही है कि सयुंक्त परिवारो में बंधन थोड़े ज्यादा होते थे पर जब भी कोई भी किसी भी मुसीबत में फंसता था तो वो घर में किसी ना किसी वरिष्ठ परिजन से सलाह लेकर उस समस्या से निपटने का प्रयास करता था और उसे पता होता था कि कि कैसी भी परिस्थिति क्यों ना हो परिवार साथ में खड़ा रहेगा, यहाँ तक कि अगर घर में एक वयस्क पुरुष की मृत्यु भी हो जाये तो उसके बच्चे बाबा,ताऊ और चाचाओं के संरक्षण में अच्छे ढंग से परवरिश पाकर जिंदगी में बेहतर कर पाते थे, पर अब तो एकल परिवार का प्रचलन आ गया है तो जिंदगी मै जो भी उतार चढ़ाव आये उनसे उसे खुद ही जूझना पड़ता है और ऐसी परिस्थितियों में व्यक्ति का मानसिक रूप से टूटना प्रारम्भ हो जाता है, चूँकि जिंदगी में इतनी आपाधापी बढ़ गयी है कि व्यक्ति खुद को ही ठीक ढंग से नही सम्हाल पाता है तो वो दूसरे को मानसिक रूप से सपोर्ट भी नही कर पाता है और खुदा ना खास्ता अगर पति-पत्नी में से एक का भी आकस्मिक निधन हो जाये तो पूरा परिवार तबाही की कगार पर खड़ा हो जाता है लेकिन वर्तमान समय की जीवन शैली ही ऐसी है कि सयुंक्त परिवार की बजाय एकल परिवार को ज्यादा प्राथमिकता दी जा रही है क्यूंकि हर कोई स्वतंत्र रहना चाहता है फिर चाहे उसकी कितनी और कैसी भी कीमत क्यों ना चुकानी पड़े जय हो   

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