सच में बड़ा दुःख होता जब किसी को अभिव्यक्ति की आज़ादी के नाम देश को ख़त्म करने,देश के टुकड़े करने की बात करते देखता हूँ और उससे भी ज्यादा दुःख तब होता है जब संवेधानिक पदो पर बैठे लोग अभिव्यक्ति की आज़ादी के नाम पर ऐसे व्यक्तियों और संस्थाओ का समर्थन करते है , प्रधानमंत्री को पत्र लिखते है , राष्ट्रपतिजी से गुहार लगाते है , क्या कीजियेगा ऐसे संवेदनहीन और देशके प्रति भावनाहीन लोगो का , सच्चाई तो यह है कि आज़ाद और लोकतान्त्रिक देश में है अगर कही और होते तो इनकी दुर्दशा तय थी
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