गोरखपुर मे बीआरडी मेडिकल कालेज में पिछले 6 वर्षो मे 3700 बच्चों की जापानीज एनसिफेलाइटिस से हुयी मौतो पर बहुत कुछ लिखा जा चुका है
और झारखंड में अनपढ मुस्लिम समुदाय द्धारा जापानीज एनसिफेलाइटिस के वैक्सीन अपने बच्चों को लगवाने से मना कर दिया था क्योंकि उनके समुदाय के कुछ शरारती तत्वों ने उन्हें बहका दिया था कि अगर बच्चों को ये वैक्सीन लगेंगे तो बच्चे नपुंसक हो जायेंगे।
लेकिन समझते की बात यह है कि इतनी संख्या में बच्चों को जापानीज एनसिफेलाइटिस क्यों हो रहा है आखिर इसका कारण क्या है ?
इसका कारण है चावल के खेतो मे पनपने वाले मच्छर जिसमें क्यूलेक्स ट्रायटेनियरहिंचस समूह के मच्छर प्रमुख हैं ये मच्छर पालतू सुअर और जंगली पक्षियों ( जो सुअर और जंगली पक्षी जापानीज एनसिफेलाइटिस वायरस से संक्रमित होते है ) को काटने से संक्रमित हो जाते है और जब ये मच्छर मनुष्य या जानवर को काटते हैं तो वह मनुष्य या जानवर जापानीज एनसिफेलाइटिस से संक्रमित हो जाता है। जापानीज एनसिफेलाइटिस वायरस पालतू सुअर और जंगली पक्षियों के रक्त में परिवर्धित होते है और ये एक मनुष्य से दूसरे मनुष्य में नहीं फैलता है यह मच्छरो के काटने से ही फैलता है।
जापानीज एनसिफेलाइटिस के साधारण प्रकार मे सिरदर्द और बुखार जैसे लक्षण दिखाई देते है कोई गंभीर लक्षण नहीं होते है लेकिन जापानीज एनसिफेलाइटिस के गंभीर प्रकार मे सिरदर्द, बुखार, गर्दन में अकडन, घबराहट, कोमा में चले जाना, मस्तिष्क की निष्क्रियता, पक्षाघात इत्यादि लक्षण हो सकते है।
दुर्भाग्य से जापानीज एनसिफेलाइटिस के गंभीर प्रकार की कोई विशेष चिकित्सा पद्धति नहीं है मरीज को गहन चिकित्सा इकाई ( आईसीयू) मे रखकर इलाज किया जाता है।
जापानीज एनसिफेलाइटिस संक्रमण सामान्यतः शहरों में नहीं होकर ग्रामीण क्षेत्रों में होता है।
अब यह चिंतन का विषय है कि जापानीज एनसिफेलाइटिस संक्रमण को कैसे रोका जाए और इसके लिए तीन स्तर पर काम हो सकता है, एक पालतू सुअर और जंगली पक्षियों को संक्रमित होने से बचाया जाए जो मुश्किल उपाय है दूसरा मच्छरों की संख्या को नियंत्रित किया जाये जो शासन प्रशासन का दायित्व है और तीसरा बच्चों और बडो को मच्छर से काटने से बचाया जाए ताकि वह जापानीज एनसिफेलाइटिस से संक्रमित नहीं हो यह परिवार और समाज के स्तर का काम है।
और अगर कोई भी जापानीज एनसिफेलाइटिस से संक्रमित हो जाये तो उसके इलाज के लिए जगह जगह गहन चिकित्सा इकाई ( आईसीयू ) की व्यवस्था यह केन्द्र और राज्य सरकारो का काम है लेकिन यह दीर्घकालिक योजना बनाकर ही हो सकता है और यह एकाध साल में होने वाला काम नहीं है इसके लिए ठीक ढंग से योजना बनाई जाये और उस पर साल दर साल अमल किया जायेगा तो ही हो सकता है अन्यथा यूँ ही हजारों लोग जापानीज एनसिफेलाइटिस से मरते रहेंगे।
प्रमेंन्द्र उवाच
और झारखंड में अनपढ मुस्लिम समुदाय द्धारा जापानीज एनसिफेलाइटिस के वैक्सीन अपने बच्चों को लगवाने से मना कर दिया था क्योंकि उनके समुदाय के कुछ शरारती तत्वों ने उन्हें बहका दिया था कि अगर बच्चों को ये वैक्सीन लगेंगे तो बच्चे नपुंसक हो जायेंगे।
लेकिन समझते की बात यह है कि इतनी संख्या में बच्चों को जापानीज एनसिफेलाइटिस क्यों हो रहा है आखिर इसका कारण क्या है ?
इसका कारण है चावल के खेतो मे पनपने वाले मच्छर जिसमें क्यूलेक्स ट्रायटेनियरहिंचस समूह के मच्छर प्रमुख हैं ये मच्छर पालतू सुअर और जंगली पक्षियों ( जो सुअर और जंगली पक्षी जापानीज एनसिफेलाइटिस वायरस से संक्रमित होते है ) को काटने से संक्रमित हो जाते है और जब ये मच्छर मनुष्य या जानवर को काटते हैं तो वह मनुष्य या जानवर जापानीज एनसिफेलाइटिस से संक्रमित हो जाता है। जापानीज एनसिफेलाइटिस वायरस पालतू सुअर और जंगली पक्षियों के रक्त में परिवर्धित होते है और ये एक मनुष्य से दूसरे मनुष्य में नहीं फैलता है यह मच्छरो के काटने से ही फैलता है।
जापानीज एनसिफेलाइटिस के साधारण प्रकार मे सिरदर्द और बुखार जैसे लक्षण दिखाई देते है कोई गंभीर लक्षण नहीं होते है लेकिन जापानीज एनसिफेलाइटिस के गंभीर प्रकार मे सिरदर्द, बुखार, गर्दन में अकडन, घबराहट, कोमा में चले जाना, मस्तिष्क की निष्क्रियता, पक्षाघात इत्यादि लक्षण हो सकते है।
दुर्भाग्य से जापानीज एनसिफेलाइटिस के गंभीर प्रकार की कोई विशेष चिकित्सा पद्धति नहीं है मरीज को गहन चिकित्सा इकाई ( आईसीयू) मे रखकर इलाज किया जाता है।
जापानीज एनसिफेलाइटिस संक्रमण सामान्यतः शहरों में नहीं होकर ग्रामीण क्षेत्रों में होता है।
अब यह चिंतन का विषय है कि जापानीज एनसिफेलाइटिस संक्रमण को कैसे रोका जाए और इसके लिए तीन स्तर पर काम हो सकता है, एक पालतू सुअर और जंगली पक्षियों को संक्रमित होने से बचाया जाए जो मुश्किल उपाय है दूसरा मच्छरों की संख्या को नियंत्रित किया जाये जो शासन प्रशासन का दायित्व है और तीसरा बच्चों और बडो को मच्छर से काटने से बचाया जाए ताकि वह जापानीज एनसिफेलाइटिस से संक्रमित नहीं हो यह परिवार और समाज के स्तर का काम है।
और अगर कोई भी जापानीज एनसिफेलाइटिस से संक्रमित हो जाये तो उसके इलाज के लिए जगह जगह गहन चिकित्सा इकाई ( आईसीयू ) की व्यवस्था यह केन्द्र और राज्य सरकारो का काम है लेकिन यह दीर्घकालिक योजना बनाकर ही हो सकता है और यह एकाध साल में होने वाला काम नहीं है इसके लिए ठीक ढंग से योजना बनाई जाये और उस पर साल दर साल अमल किया जायेगा तो ही हो सकता है अन्यथा यूँ ही हजारों लोग जापानीज एनसिफेलाइटिस से मरते रहेंगे।
प्रमेंन्द्र उवाच