Thursday, 24 August 2017

गोरखपुर मे बीआरडी मेडिकल कालेज में पिछले 6 वर्षो मे 3700 बच्चों की जापानीज एनसिफेलाइटिस से हुयी मौतो पर बहुत कुछ लिखा जा चुका है

और झारखंड में अनपढ मुस्लिम समुदाय द्धारा जापानीज एनसिफेलाइटिस के वैक्सीन अपने बच्चों को लगवाने से मना कर दिया था क्योंकि उनके समुदाय के कुछ शरारती तत्वों ने उन्हें बहका दिया था कि अगर बच्चों को ये वैक्सीन लगेंगे तो बच्चे नपुंसक हो जायेंगे।

लेकिन समझते की बात यह है कि इतनी संख्या में बच्चों को जापानीज एनसिफेलाइटिस क्यों हो रहा है आखिर इसका कारण क्या है ?
इसका कारण है चावल के खेतो मे पनपने वाले मच्छर जिसमें क्यूलेक्स ट्रायटेनियरहिंचस समूह के मच्छर प्रमुख हैं ये मच्छर पालतू सुअर और जंगली पक्षियों ( जो सुअर और जंगली पक्षी जापानीज एनसिफेलाइटिस वायरस से संक्रमित होते है ) को काटने से संक्रमित हो जाते है और जब ये मच्छर मनुष्य या जानवर को काटते हैं तो वह मनुष्य या जानवर जापानीज एनसिफेलाइटिस से संक्रमित हो जाता है। जापानीज एनसिफेलाइटिस वायरस पालतू सुअर और जंगली पक्षियों के रक्त में परिवर्धित होते है और ये एक मनुष्य से दूसरे मनुष्य में नहीं फैलता है यह मच्छरो के काटने से ही फैलता है।

जापानीज एनसिफेलाइटिस के साधारण प्रकार मे सिरदर्द और बुखार जैसे लक्षण दिखाई देते है कोई गंभीर लक्षण नहीं होते है लेकिन जापानीज एनसिफेलाइटिस के गंभीर प्रकार मे सिरदर्द, बुखार, गर्दन में अकडन, घबराहट, कोमा में चले जाना, मस्तिष्क की निष्क्रियता, पक्षाघात इत्यादि लक्षण हो सकते है।

दुर्भाग्य से जापानीज एनसिफेलाइटिस के गंभीर प्रकार की कोई विशेष चिकित्सा पद्धति नहीं है मरीज को गहन चिकित्सा इकाई ( आईसीयू) मे रखकर इलाज किया जाता है।
 जापानीज एनसिफेलाइटिस संक्रमण सामान्यतः शहरों में नहीं होकर ग्रामीण क्षेत्रों में होता है।
अब यह चिंतन का विषय है कि जापानीज एनसिफेलाइटिस संक्रमण को कैसे रोका जाए और इसके लिए तीन स्तर पर काम हो सकता है, एक पालतू सुअर और जंगली पक्षियों को संक्रमित होने से बचाया जाए जो मुश्किल उपाय है दूसरा मच्छरों की संख्या को नियंत्रित किया जाये जो शासन प्रशासन का दायित्व है और तीसरा बच्चों और बडो को मच्छर से काटने से बचाया जाए ताकि वह जापानीज एनसिफेलाइटिस से संक्रमित नहीं हो यह परिवार और समाज के स्तर का काम है।

और अगर कोई भी जापानीज एनसिफेलाइटिस से संक्रमित हो जाये तो उसके इलाज के लिए जगह जगह गहन चिकित्सा इकाई ( आईसीयू ) की व्यवस्था यह केन्द्र और राज्य सरकारो का काम है लेकिन यह दीर्घकालिक योजना बनाकर ही हो सकता है और यह एकाध साल में होने वाला काम नहीं है इसके लिए ठीक ढंग से योजना बनाई जाये और उस पर साल दर साल अमल किया जायेगा तो ही हो सकता है अन्यथा यूँ ही हजारों लोग जापानीज एनसिफेलाइटिस से मरते रहेंगे।

प्रमेंन्द्र उवाच

Tuesday, 11 July 2017

वाकई एक सारगर्भित पढने और गुनने लायक पोस्ट, आप इससे सहमत या असहमत हो सकते है लेकिन उपेक्षा नहीं कर सकते है

आचार्य Vinay Jha ने विभिन्न
मुद्दों पर बात रखी है,
हो सकता है सब सहमत न हों, लेकिन विचारणीय तो ज़रूर है तथ्य

यहूदियों पर लिखने की इच्छा नहीं थी | कई यहूदी मेरे मित्र हैं | एक यहूदी महिला तो इजराइल से अपने खर्चे पर उडुपी (कर्नाटक) के वैदिक सम्मलेन में भाग लेने आयी थी और वहाँ मेरे समझाने पर वचन दिया कि अब कभी गोमाँस नहीं खायेंगी | वर्तमान में इजराइल भी भारत का मित्र है |
किन्तु एक प्रश्न आया था यहूदियों के बारे में, झूठ उत्तर मैं नहीं दे सकता, अतः मैंने उनके पूरे इतिहास का संक्षेप में वर्णन कर दिया |
अन्धभक्तों को पढने से मना किया था, किन्तु नहीं माने, पढ़कर अपशब्दों या निराधार आक्षेपों की बौछार करने लगे, या फिर झूठी बकवास पोस्ट करने लगे |
पहले भीमासुरों के विरुद्ध लिखा तब भी ऐसी ही उग्र प्रतिक्रया आयी | आर्यसमाजियों ने आकर बवाल किया तो उनपर भी लिखना पडा, वे भी उछल-कूद करने लगे | किसी के पास तर्क नहीं |
लेकिन ब्राह्मणों के दोष पर लिखा तो किसी ब्राह्मण ने गाली नहीं दी, और ब्राह्मण-विरोधियों को मजा आया !!
आज यहूदियों पर लिखा तो हिन्दू की खाल में यहूदी संस्कार वालों ने बड़ा उधम मचाया ! कई दर्जन को अमित्र या ब्लॉक करना पडा -- क्योकि मैंने बारम्बार कहा कि तथ्यों और तर्कों द्वारा मेरी बात काटें, गाली या झूठ या कुतर्क द्वारा नहीं | मैं ईसा मसीह का अनुयायी नहीं हूँ जो एक चांटे के जवाब में दूसरा गाल बढ़ा दूँ | मैं तो वैष्णव हूँ, किन्तु कलियुगी वैष्णव नहीं जो श्रीकृष्ण के चरित्र से नहीं सीखते, केवल रासलीला को धर्म समझते हैं | मैं तो उस विष्णु का चेला हूँ जो राक्षसों का वध करने और धर्म की संस्थापना के लिए बारम्बार अवतार लेते हैं -- विष्णु का यह मार्ग ही असली वैष्णव धर्म है | सेमेटिक (यहूदी, ईसाई, मुस्लिम, आदि, सेमेटिक लोगों में प्राचीनतम जाति अपने को "असुर" कहती थी जिनका साम्राज्य मेसोपोटामिया के आसपास दीर्घकाल तक था और इसापूर्ब 600 में समाप्त हो गया , असल में समाप्त नहीं हुआ, नाम बदल लिया) लोगों में "धर्म" नाम की कोई चीज नहीं होती, "सम्प्रदाय" होता है और उनके सारे सम्प्रदाय कट्टर, असहिष्णु और कूपमंडूकी होते हैं, संसार के इतिहास में सम्प्रदाय के नाम पर सारे कत्लेआम केवल और केवल सेमेटिक संप्रदायवादियों ने ही कराया, जिनमें सबसे पुराना बचा हुआ सम्प्रदाय यहूदी है और इनके पूर्वज अपने को "असुर" कहते थे |
रक्षा मन्त्रालय के अधीन DRDO के एक अधिकारी Ravi Sisodia जी ने मेरे पिछले पोस्ट में एक कमेन्ट में लिखा कि भारतीय सेना के लिए कानपुर की Ordnance Equipment Factory में जूते बनते हैं | उत्तर में मैंने उनको प्रमाण दिया कि उसी कारखाने का जूता इजराइल खरीदकर अपना लेबल साटकर 1997 से बेच रहा है और मनोहर पर्रिकर के कार्यकाल में भारतीय सेना के लिए उसी कानपुरी जूते को मंहगे दाम पर इजराइल से आयात करने का निर्णय लिया गया है | बिना घूसखोरी के यह सम्भव नहीं है | मैंने यह उत्तर उनको दिया था :--
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आप सही कहते हैं कि कानपुर में सेना के लिए जूते बनते हैं | लेकिन आपने यह नहीं कहा कि ये भारतीय जूते विश्व से सबसे अच्छे जूते हैं जो एक सच्चाई है | इजराइल की सेना के लिए जूते बनाने वाली कम्पनी 1997 से ही कानपुर की फैक्ट्री से इजराइली सेना के लिए जूते खरीदती रही है, वह कम्पनी इस व्यवसाय में विश्व में अग्रणी मानी जाती है !! भारतीय जूते पर अपना ठप्पा मारकर पूरी दुनिया में बेचती है और नाम इजराइल का होता है | हज़ारों सालों से यहूदी ऐसे ही करामात दिखाते आये हैं | लेकिन आपको पता नहीं है कि माननीय मनोहर पर्रिकर के कार्यकाल में उसी इजराइली कम्पनी से कानपुरी जूते इजराइल के ठप्पे सहित आयातित करने का सौदा हुआ ; उस कम्पनी का बयान सुन लें :--- http://bharatshakti.in/army-shoes-from-israel-made-in-india%E2%80%8B/
अब आप ही बताइये -- बिना घूस के क्या ऐसा सम्भव है ?? आपके विभाग का मामला है, अतः आप ही बता सकते हैं कि इस मामले में कितनी घूस किसको मिली होगी | लेकिन इस मामले में टांग घुसाइयेगा तो नौकरी चली जायेगी, बहुत तगड़ी माफिया है, ब्रिटिश काल से ही | वहाँ RTI भी काम नहीं देगा, रक्षा का मामला जो ठहरा !! नौसेना के एडमिरल को इस्तीफा देना पडा ! जनरल वी के सिंह का एक साल गायब हो गया, आज भी उनको रक्षा मंत्रालय से दूर रखा जा रहा है -- आप किस खेत की मूली हैं भाई साहब ? हमारे सैनिक सीमा पर खून बहाते हैं, लेकिन उनको पता नहीं है कि भारतीय सेना के असली मालिक वे लोग हैं जिन्हीने कभी युद्ध नहीं देखा, कभी बंदूकें नहीं छूईं -- IAS अफसर जो रक्षा मन्त्रालय की बड़ी कुर्सियों पर कब्जा जमाये बैठे रहते हैं | अरे भाई, IAS को रक्षा मन्त्रालय से कान पकड़कर निकाल बाहर कर दो, आतंकवाद और नक्सलवाद से लेकर पाकिस्तान और चीन तक सब सीधे हो जायेंगे |
मेरे पेज पर कुछ लिखने से पहले तथ्यों की जाँच कर लें | भारतीय सेना में संचार हेतु जो cryptography सॉफ्टवेयर प्रयुक्त होता है वह मेरे बड़े भाई साहब द्वारा बनाया हुआ था और वाजपेयी जी के कार्यकाल में स्वीकृत हुआ था -- घूस की जो रकम काट ली गयी थी वह वाजपेयी जी के कारण वापस लौटा दी गयी थी | आपलोग घूस पहले काट लेते हैं, बाँकी रकम का चेक बाद में देते हैं, सिविलियन उपक्रमों में रकम पूरी दी जाती है लेकिन घूस टेबल के नीचे से लिया जाता है ! उसके बाद से मेरे भाई साहब ने सेना के लिए कार्य करना छोड़ दिया | मेरा छोटा भाई सेना के कोर्ट मार्शल कोर्ट में जज है, पहले military intelligence में अफसर था |...
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पिछले लेख में अन्धभक्तों से मैंने आग्रह किया था कि मेरे लेख से दूर रहें | नहीं माने, गरियाने चले आये ! अब मैं आग्रह कर रहा हूँ कि आओ अन्धभक्तों, जी खोलकर मुझे गरिआओ, लेकिन खोपड़ी में थोड़ा सा भी भेजा बचा हुआ हो तो सिद्ध कर दो कि भारत सरकार के रक्षा मन्त्रालय के अधीन कारखाने का जूता इजराइल भेजकर फिर वहाँ से मंहगे मूल्य में मंगाने के पीछे घूसखोरी नहीं बल्कि कोई दूसरा कारण है !! शायद इजराइल का लेबल लग जाने से कानपुर का जूता बेहतर हो जाएगा और सेना के जवान मँहगे जूते पहनकर ठीक से युद्ध कर पायेंगे !
यह तो छोटा सा मामला है | इससे बहुत बड़ा घूसखोरी का मामला बताऊँ ? मोदी जी ने राफेल युद्धक विमान खरीदे तो सुब्रह्मण्यम स्वामी जी ने बिगड़कर घूसखोरी के आरोप लगाए थे | उनके पेज पर जाकर मैंने विरोध किया और स्वामी जी को समझाया कि भारतीय सेना को सोनिया लगभग बर्बाद कर चुकी है, राष्ट्र की रक्षा हेतु शीघ्रताशीघ्र राफेल खरीदना अनिवार्य है जिसका कारण भी मैंने बताया | एक राफेल में तीन ब्रह्मोस मिसाइल लगाए जा सकते हैं जो चीन के भीतर 2290 किलोमीटर तक जाकर भारत का हाइड्रोजन बम फेंककर वापस आ सकता है, मैंने यह प्रमाण भी दिया था कि वाजपेयी जी ने हाइड्रोजन बम का विस्फोट कराया था जिसे बिकाऊ मीडिया एटम बम कह रही है ताकि पाकिस्तान समर्थकों का हौसला बुलन्द रहे |राफेल में हाइड्रोजन बम ही वह ब्रह्मास्त्र है जिसकी बदौलत आज भारत चीन के भीतर घुसकर ललकार रहा है |  मोदी सरकार ने खरीद का जो मूल्य बताया उसे सही मानकर मैंने स्वामी जी को आँकड़ें दिए कि वही विमान भारत से 33% अधिक मूल्य देकर मिस्र खरीद रहा है जिससे जाहिर है कि मोदी सरकार 33% घूस नहीं लेकर सस्ते में विमान खरीद रही है |  स्वामी जी ने खेद व्यक्त करके अपने ही बयान का खण्डन कर दिया | बाद में घोषणा हुई कि 33% कम में नहीं बल्कि 67% अधिक मूल्य पर राफेल खरीदे गए थे, आरम्भ में सरकार ने झूठ बोला था | इसी कारण जनरल वी के सिंह को रक्षा मन्त्रालय से दूर रखा गया, क्योंकि उनको न तो झूठ बर्दाश्त है और न घूसखोरी |
आज जी न्यूज़ टीवी दिखा रहा है कि इजराइल से कौन कौन से रक्षा उपकरण भारत खरीद सकता है | हँसी आयी जब कश्मीर के पत्थरबाजों पर बन्दूक से रंग फेंकने वाली पिचकारी टीवी ने दिखाई ! भारत मंगलयान , हाइड्रोजन बम, ब्रह्मोस मिसाइल , आदि बना सकता है, किन्तु रंग फेंकने वाली पिचकारी इजराइल से खरीदेगा ! कानपुर में बनने वाले जूते इजराइल के यहूदी खरीदकर वापस मंहगे मूल्य पर हमें बेचते हैं तो हमारा रक्षा मन्त्रालय अपने ही कारखाने का जूता कानपुर से न खरीदकर इजराइल से क्यों मंगा रहा है ?
मनोहर पर्रिकर के कार्यकाल में यह निर्णय लिया गया | मुझे अच्छी तरह मालूम है कि मनोहर पर्रिकर ने पूरे जीवन में कभी एक पैसा भी घूस खाया हो इसका कोई प्रमाण नहीं है, इस मामले में भी उन्होंने एक पैसा नहीं लिया | राफेल में भयंकर घूसखोरी हुई, किन्तु न तो मोदी जी ने घूस खाया और न ही रक्षा मन्त्री ने | परन्तु प्रधानमन्त्री और रक्षामन्त्री की ताक़त नहीं है कि रक्षा सामग्री में घूसखोरी को बन्द करा दे , क्योंकि आरम्भ से ही घूसखोरी का तन्त्र इतना जबरदस्त है कि अब किसी की मजाल नहीं है कि इसे बन्द कराये | बोफोर्स तोप में भी 3% घूसखोरी हुई थी जो क्वात्रोच्ची ने लिया था, सोनिया के प्रभाववश ऐसा हुआ था | राफेल में उससे बहुत अधिक घूसखोरी हुई है लेकिन कांग्रेस चुप है -- क्योंकि कांग्रेस जानती है कि भाजपा सरकार ने घूस नहीं खाया , और जिनलोगों ने खाया वे कांग्रेस के बनाए सिस्टम के पुर्जे हैं, उनके विरुद्ध कांग्रेस कुछ नहीं बोल सकती | घूस के बावजूद बोफोर्स बेहतरीन तोप है, राफेल भी बहुत उम्दा युद्धक विमान है, और इजराइल से आने वाला कानपुरी जूता भी विश्व का सर्वश्रेष्ठ जूता है | कई गुने अधिक मूल्य देकर भारतीय जूता इजराइल से मँगाया जा रहा है !!
अब अन्धभक्तों को मिर्ची लगेगी | इजराइल के यहूदियों ने कितना घूस किस-किस को दिया यह RTI से उपलब्ध नहीं होगा क्योंकि रक्षा के मामले में RTI बेअसर है | राफेल खरीदना तो आवश्यक भी था क्योंकि भारत के पास वैसा विमान बनाने की क्षमता नहीं है | हम चाहें तो बना सकते हैं, लेकिन बनायेंगे नहीं (2011 ईस्वी में ही राफेल की फैक्ट्री भारत में लगाने के लिए फ्रांस तैयार हो गया था किन्तु इसके लिए भारत सरकार के कारखाने HAL में जो सुधार करने पड़ेंगे उसका आरम्भ करने का निर्णय भी आजतक नहीं लिया गया है -- भारत में ही राफेल बनेंगे तो कमीशन कैसे खायेंगे?)| तेजस विमान परियोजना को रोक-रोक कर कई दशक तक घसीटा गया, जब-जब भाजपा सरकार आयी तब-तब उस परियोजना में तेजी आयी वरना तेजस कभी बन ही नहीं पाता ! लेकिन किसी युद्धक विमान को बनाने में आप 30 वर्ष लगा देंगे तो जब वह परियोजना पूरी होगी तबतक उसकी तकनीक पुरानी पड़ जायेगी ! यही कारण है कि जबतक हम तेजस बना पाते तबतक राफेल खरीदने के लिए हम विवश हो गए | जनवरी 2012 में ही भारतीय वायुसेना के विशेषज्ञों ने राफेल को सबसे उपयुक्त विमान घोषित कर दिया था, किन्तु सोनिया ने चुपचाप खरीद रुकवा दी ताकि भारत को कमजोर किया जा सके | इसपर मैं बहुत विस्तार से पहले लिख चुका हूँ |
यह घूसखोरी सेना में भी है | जनरल वी के सिंह को इसी कारण हटना पड़ा था | भारत की रक्षा नीति सेना के अधिकारी नहीं बनाते, IAS अफसर बनाते हैं, यह बात एक सेवानिवृत मेजर-जनरल ने जी-न्यूज़ टीवी पर बताया था | इन IAS अफसरों ने कभी बन्दूक छूआ भी नहीं | लेकिन हर विभाग में सारे अन्तिम निर्णय वे ही लेंगे, सरकार को केवल मुहर लगाने का भार है | मोदी जी केवल भाषण दे सकते हैं और IAS लॉबी के निर्णयों पर ठप्पा लगा सकते हैं -- इसी का नाम है "भारत सरकार" !
हँसी आती है जब मोदी सरकार के तीन वर्षों से अधिक बीतने पर भी JNU के वामपन्थियों के विरुद्ध अन्धभक्तों की फ़ौज फेसबुक पर हंगामा मचाती है -- यह कोई नहीं पूछता कि तीन वर्षों के दौरान तीन सौ से अधिक नयी बहालियाँ JNU में शिक्षक पद पर हुई उसमें एक भी राष्ट्रवादी क्यों नहीं है, सब के सब नए शिक्षक वामपन्थी या कांग्रेसी ही क्यों हैं ? इसका कारण यह है कि RSS ने कभी देश की शिक्षा प्रणाली को सुधारना अपना लक्ष्य नहीं माना, केवल सरस्वती शिशु मन्दिर खोलकर सन्तुष्ट रहे | उच्च शिक्षा को सुधारने के लिए तो आंशिक प्रयास भी नहीं किया | जब राष्ट्रवादी बुद्धिजीवी निर्माण करने का आप प्रयास ही नहीं करेंगे तो JNU जैसी संस्थाओं से निकलने वाले लोग ही प्रोफेसर और IAS अफसर बनेंगे | मैकॉले की शिक्षा प्रणाली को ये राष्ट्रवादी संघी लोग गरियाते तो बहुत हैं, किन्तु स्वतन्त्रता के बाद से आजतक कुल ग्यारह वर्षों तक देश की सर्वोच्च सत्ता RSS के हाथों में रही है -- शिक्षा व्यवस्था में सुधार हेतु क्या किया यह तो कोई बता दे ?
मुझे ग्यारह दिनों के लिए ही सर्वोच्च सत्ता सौंप दो (मुझे सत्ता नहीं चाहिए, केवल उदाहरण दे रहा हूँ) तो सारे प्रोफेसरों और अफसरों की दोबारा परीक्षा लेकर सबको नौकरी से बर्खास्त करा दूंगा, केवल ईमानदारों को बख्शूंगा, अच्छे बुद्धिजीवी कहाँ और कैसे मिलेंगे यह मैं जानता हूँ | देश में मेधावी और ईमानदार लोगों की कमी नहीं है | अमरीका से दोगुना वेतन देकर (भ्रष्टाचार बन्द हो तो पैसे की कमी नहीं रहेगी) भारतीय वैज्ञानिकों को भारत बुला लूँगा, उनमें से अधिकाँश को भारत से प्रेम है, विवश होकर अमरीका गए हैं -- अमरीका एक ही रात में टांय-टांय फिस्स हो जाएगा | वहाँ के अधिकाँश ग्रेजुएट यूनिवर्सिटी से निकलकर शोधकार्य नहीं करते, बेरोजगारी भत्ता लेकर बैंकाक में मालिश कराते हैं, लॉस वेगास की अपेक्षा बैंकाक सस्ता पड़ता है | अमरीका के 80% शोधकर्ता भारतीय और चीनी हैं | अमरीका में 99% शोध परियोजनाओं के प्रमुख यहूदी और ईसाई होते हैं जबकि उन परियोजनाओं का वास्तविक शोधकार्य करने वाले 80% लोग हिन्दू और चीनी हैं , परन्तु मान्यता और पुरस्कार प्रमुख को मिलता है | अभी भी भारत सॉफ्टवेयर में महाशक्ति है, अमरीका से भारतीय वैज्ञानिक यदि भारत लौट आयें तो पूरी दुनिया एक ही रात में भारत के आगे घुटने टेक देगी -- हमें केवल यह गारण्टी देनी होगी कि भारत में उनको शोध हेतु अवसर और जीने की अच्छी सुविधा मिलेगी | मुद्रा की क्रयशक्ति को आधार बनाएं तो भारत के प्रोफेसर आज संसार में सबसे अधिक वेतन पा रहे हैं (रूपये की क्रयशक्ति घरेलू बाज़ार में डॉलर की तुलना में 17 गुनी कम है, अर्थात एक डॉलर जितना सामान खरीद सकता है उतना आप 17 रुपये में खरीद सकते हैं, लेकिन यहूदियों के बैंकों ने रुपये को चार गुना सस्ता बनाकर भारत की भयंकर लूट आज भी जारी रखी है, एक भारतीय प्रोफ़ेसर इस हिसाब से वार्षिक सवा लाख डॉलर पाता है जो अमरीकी प्रोफ़ेसर से बहुत अधिक है) , और एकाध अपवादों को छोड़कर कोई भारतीय प्रोफेसर कुछ नहीं करता, उनमें से बहुत तो केवल हिन्दुत्व के विरुद्ध वातावरण बनाने में ही व्यस्त रहते हैं | और भी बहुत कुछ सम्भव है ग्यारह दिनों में | जारशाही को जड़ से उखाड़कर फेंकने में केवल दस दिन लगे थे | ग्यारह वर्षों में RSS भ्रष्ट तन्त्र का एक बाल तक नहीं उखाड़ पायी -- क्योंकि RSS के एजेंडा में ही यह नहीं है | RSS तो 92 वर्ष की बूढ़ी है, 11 वर्षों तक सत्ता में रही है !! भूकम्प में खिचड़ी बांटती है, चीन से युद्ध में स्वयंसेवकों ने कार्य किया, और भी बहुत से अच्छे कार्य RSS करती है | लेकिन जैसे हाथी को अपना देह नहीं सूझता, वैसे ही RSS अपनी ताक़त का सही प्रयोग नहीं जानती | क्योंकि उसकी मौलिक प्रशिक्षण में ही दोष है, जिस कारण मैं RSS से दूर रहकर ही उसका समर्थन करता रहा हूँ | उसे सनातन धर्म के मूल ग्रन्थों पर विश्वास नहीं है, सन्ध्यावन्दन के समय लाठी भांजते हैं, एकात्म मानववादी राष्ट्रवाद को कैसे लागू किया जाय इससे पहले "राष्ट्र" किसे कहते हैं इसकी समझ साफ़ करनी पड़ेगी | राष्ट्र केवल भौगोलिक सीमा नहीं है, सीमा से तो देश बनता है, राष्ट्र नहीं | राष्ट्र की पहचान पण्डित दीनदयाल उपाध्याय ने अच्छी तरह कराई थी | RSS की नेतृत्व मण्डली में बहुत से श्रेष्ठ लोग हैं जो यह सब जानते हैं और करने में सक्षम भी हैं | लेकिन कुछ करते नहीं !! क्योंकि RSS के दर्शन में मौलिक सुधार की आवश्यकता है, सनातन धर्म के मौलिक शास्त्र से RSS के दर्शन का तालमेल बिठाने की आवश्यकता है, वरना हिन्दू राष्ट्र केवल लफ्फाजी बनकर रह जाएगा, लेकिन यह तालमेल कोई नहीं बिठा सकता | अब तो RSS में भीमासुरों का भी दबदबा बढ़ने लगा है, भविष्य तो और भी बुरा है |
मैंने कई दशकों तक प्राचीन भाषाओं के भाषाविज्ञान पर शोधकार्य किया है | अन्त में मैंने यही पाया कि यहूदियों के कारण ऐतिहासिक भाषाविज्ञान में शोधकार्य एक सीमा के आगे बढ़ नहीं पाया, केवल भारत से यूरोप तक की भाषाओं को यूरोप से आया हुआ बताकर शोध बन्द कर दिया गया, हिब्रू और अरबी से संस्कृत, ग्रीक आदि के घनिष्ठ सम्बन्ध हैं यह सारे भाषावैज्ञानिक मानते हैं, लेकिन यहूदियों के भय से कोई कुछ नहीं करता | पश्चिम के विषविद्यालयों पर यहूदियों का दबदबा है, अरब शेखों का नहीं | अतः सेमेटिक भाषाओं की आर्य उत्पत्ति सिद्ध होने पर अरब शेख बुरा मानेंगे इसका भय नहीं है, अमरीका के सत्ताधारी यहूदी सेठ भड़केंगे जिनके लोग हर जगह भरे पड़े हैं |
ईस्ट इण्डिया कम्पनी के मालिकों में से कितना शेयर यहूदियों के पास था इसका पता लगाएं, तब यह भी पता चलेगा कि RSS, जनसंघ और भाजपा ने स्वतन्त्रता संग्राम से दूरी क्यों बनायी, स्वतन्त्रता सेनानियों को टिकट तक नहीं दिया और लफंगों को उनके विरुद्ध जिताने में सारा जोर लगाया, और यहूदियों के प्रति विशेष स्नेह क्यों रखा |
मैं सनातन धर्मशास्त्र को प्रमाण मानता हूँ, किसी आधुनिक संगठन या विचार को नहीं | आज की परिस्थिति में मोदी जैसा प्रधानमन्त्री सम्भव नहीं है, किन्तु इसका यह अर्थ नहीं है कि महादेव का अपमान करने वाला "हर हर मोदी" जैसा हिन्दू-विरोधी नारा लगाया जाय, जैसा कि अन्धभक्त लगाते हैं | आज की परिस्थिति में RSS से बेहतर राष्ट्रवादी संगठन कोई और नहीं है, किन्तु इसका अर्थ यह नहीं है कि सन्ध्यावन्दन छोड़कर लाठी भाँजने से 'हिन्दू राष्ट्र' बन जाएगा | 'हिन्दू राष्ट्र' को त्रेतायुग में एक धोबी ने ध्वस्त कर दिया, आज तो कदम-कदम पर उसी धोबी के गधे भरे पड़े हैं |
अन्धभक्तों को मिर्ची लगेगी तो गरियायेंगे और उनको ब्लॉक करने का मुझे सुअवसर मिलेगा | इजराइल से पिचकारी-गन और अमरीका से पेलेट-गन में क्यों इस गरीब देश का पैसा बर्बाद करते हो, कश्मीर के पत्थरबाजों के लिए पत्थर से बांधकर मिर्ची पाउडर का छोटा सा पैकेट ही काफी है, सबसे सस्ती पड़ेगी | अन्धभक्तों को थोड़ी सी मिर्ची अपनी आँखों में भी डाल लेनी चाहिए, कुछ काल तक कष्ट तो होगा लेकिन आँख खोलना सीख जायेंगे |
इजराइल का कोई व्यक्ति मेरा हिन्दी लेख पढ़ने नहीं आयेगा, अतः मेरे लेख से इजराइल और भारत की मैत्री पर कोई प्रभाव नहीं पड़ने वाला, इस लेख का उद्देश्य अंधभक्तों की पहचान करना है ताकि ब्लॉक कर सकूँ | मेरी "कुछ बातें" गलत हैं तो तर्क सहित खण्डन करने से किसने रोका था ? सीधे फतवा सुनाने वाले मुल्लों को मैं ब्लॉक करता हूँ | मुल्ले दो किस्म के होते हैं -- कटुए और बिन-कटुए | कटुओं को पहचानना आसान है | बिन-कटुए तो घर के भेदी और अन्धभक्त हैं, अधिक खतरनाक हैं, कब किस गोल में गेन्द डाल देंगे इसका कोई भरोसा नहीं !
असली "हिन्दू राष्ट्र" कैसे बन सकता है यह मेरे लेखों का मूल उद्देश्य है | किन्तु पहले "सेक्यूलर घर के भेदियों" और "छद्म-हिन्दू अन्धभक्तों" को बेनकाब करना आवश्यक है, क्योंकि मलबा हटाने के बाद ही नवनिर्माण सम्भव है |
यहूदी संसार में एकमात्र समुदाय है जिनके धर्मग्रन्थ में स्पष्ट आदेश है कि अपने सम्प्रदाय के लोगों से सूद न लें किन्तु अन्य सम्प्रदाय वालों से सूद लें | निवेश पर सूद की धारणा से ही बैंकिंग व्यवस्था और पूँजीवाद की उत्पत्ति हुई (यह लेख ध्यान से पढ़ें, यहूदियों ने संसार में कौन कौन से गुल आज भी खिला रखे हैं इसका खुलासा है और यह भी उल्लेख है कि अमरीका के केन्द्रीय बैंक एवं स्टॉक बाज़ार पर यहूदियों का पूर्ण नियंत्रण है --- https://realcurrencies.wordpress.com/2014/06/05/capitalism-is-jewish-usury/)| इस वेबसाइट में कहा गया है कि 1850 ईस्वी में रोथ्सचाइल्ड की पूँजी 50 अरब डॉलर थी जो 5% वृद्धि की दर पर अब एक हज़ार अरब डॉलर होनी चाहिए -- बिल गेट्स की पूँजी से सोलह गुनी अधिक ! रोथ्सचाइल्ड की आज कितनी पूँजी है यह कोई नहीं जानता क्योंकि किसी सरकार की मजाल नहीं है कि उसका बहीखाता जांचे और किसी मीडिया की हिम्मत नहीं है कि उसे पूँजीपति कहे ! इतिहासकारों की हिम्मत नहीं है कि उसे ईस्ट इंडिया कंपनी का मालिक कहे | उन्नीसवीं शती में भी यूरोप की सभी सरकारों को यह घराना सूद पर कर्ज देता था और युद्धरत देशों के दोनों पक्षों की कर्ज देकर सहायता करता था | आज भी अमरीका में बैठकर ये लोग भारत और पाकिस्तान दोनों को हथियार बेचते हैं लेकिन अपना नाम जाहिर नहीं करते | संसार के सभी बैंकों पर इन लोगों का कब्जा है | इस वेबलेख में यहूदी धर्मग्रन्थ को उद्धृत किया गया है कि उनके सर्वोच्च देवता यहवह (यहोवा) का आदेश है कि यहूदियों को सूदखोरी द्वारा पूरे संसार का दिग्विजय करना है :-- YHVH emphatically orders the Jews several times to conquer the world with Usury in Deutoronomy, for instance: “15:6 For the LORD thy God blesseth thee, as he promised thee: and thou shalt lend unto many nations, but thou shalt not borrow; and thou shalt reign over many nations, but they shall not reign over thee.”
अब बताइये, अल्लाह ने कहा कि तलवार के बलपर दुनिया को जीतो और उनके धर्मभाई यहवह ने कहा कि सूदखोरी द्वारा दूसरे लोगों को गुलाम बनाओ !! यह भी कोई धर्म हुआ ??? छद्म-हिन्दू अन्धभक्तों को लगता है कि यहूदी भारत का बड़ा उपकार करेंगे तो उन्हें मनमोहन सिंह के चरण छूने चाहिए जिन्होंने ऑक्सफ़ोर्ड में कहा था कि ब्रिटिश राज, अर्थात यहूदी रोथ्सचाइल्ड की ईस्ट इंडिया कम्पनी का राज, भारत के लिए कल्याणकारी था ! मनमोहन सिंह की पार्टी तब क्यों दावा करती है कि चरखा दिखाकर उनलोगों ने अंग्रेजों को भगा दिया ? कांग्रेस से बेहतर तो RSS है जिसने चरखा भी नहीं दिखाया, स्वतन्त्रता संग्राम में बिना भाग लिए ही अंग्रेजो को भगा दिया और राष्ट्रवाद के सबसे बड़े महन्थ बन बैठे -- न कभी सन्ध्यावन्दन किया, न कोई यज्ञ, न किसी हिन्दू धर्मशास्त्र में आस्था है, और न रामजन्मभूमिमंदिर के निर्माण में , लेकिन सबसे बड़े हिन्दुत्ववादी हैं !
किन्तु इतना जोड़ दूँ कि विकल्प खतरनाक हैं, अतः देश की जो परिस्थिति है उसे देखते हुए भाजपा की सरकार आवश्यक है | कम से कम अपने को हिन्दू तो कहते हैं !
आज इजराइल हमारा मित्र है | जिस दिन हम रूपये की असली क्रयशक्ति स्थापित करा देंगे (बहुत आसान है, केवल अमरीका विरोधी सरकार चाहिए जो ब्राज़ील, रूस, चीन, आदि से वस्तु विनिमय को बढ़ावा दे जिसका निर्णय BARC ने पहले से कर रखा है किन्तु अमरीका से घूस खाने वाले नेता ऐसा होने नहीं देते), जिस दिन  हम आत्मनिर्भर बनने को प्राथमिकता देंगे, उस दिन दुनिया के यहूदी हमारे शत्रु बन जायेंगे क्योंकि वैश्विक पूँजीवाद पर यहूदियों का ही कब्जा है |

Thursday, 29 June 2017

बहुत दिनों से गौसेवा और गौहत्या पर अखबारों में, न्यूज चैनल्स पर, सोशल मीडिया पर पढ रहा हूँ और देख रहा हूँ,

लेकिन मेरे दिल में कई प्रश्न खडे हो रहे है

क्या जो लोग गौसेवा के नाम पर काम कर रहे हैं वो अपनी जिम्मेदारी ठीक ढंग से निभा रहे हैं ?

 क्या सिर्फ़ गौहत्या रोकना ही गौसेवा है ?

क्या गौरक्षा के नाम पर लोगो से मारपीट ही गौसेवा है ?

या फिर गाय को माता मानकर गायो की सेवा करना चाहिए

शहरों में जाओ गाँव में जाओ सभी जगह एक नजारा जरूर दिखता है कि सडको पर ढेर सारे पशु कब्जा जमाये रहते है, गांव में तो किसान परेशान हैं इन जानवरों से क्योंकि ये फसलों को नुकसान पहुंचा रहे हैं और शहरो मे जानवर सडक पर जमे रहते हैं और ट्रैफिक जाम करते रहते है, यहाँ तक की हाइवेज पर भी कई दुर्घटनाओं का कारण अचानक ही इन जानवरों के वाहन के सामने आ जाना होता है

जो भी लोग सच्चे मन से गौसेवा करना चाहते हैं उन लोगों को सबसे पहले इन आवारा पशुओं की चिंता करनी चाहिए तभी सच्चे अर्थ मे गौसेवा करेंगे अन्यथा गायो के नाम पर ये सिर्फ दिखावा है और इससे गायो का कोई भला नहीं होने वाला है
और

आखिरी मे उन लोगों से गुजारिश जो मांसाहारी भोजन करते हैं, आप मांसाहारी भोजन करिये लेकिन उन लोगों की भावनाये तो मत भडकाइये जिनके लिए गाय माता का दर्जा रखती है और उनकी भावनाये गाय से जुडी हुई हैं अन्यथा ऐसी घटनाएं होती रहेंगी जो सिर्फ समाज में वैमनस्यता को ही बढावा देगी।

जयहिंद

Friday, 21 April 2017

सोनू निगम के सोशल मीडिया पर किए गए ट्विट के बाद कुछ मुसलमान उनके खिलाफ नजर आ रहे हैं। यहां तक कि एक मौलवी ने तो उनके खिलाफ फतवा तक जारी कर दिया । लेकिन वहीं दूसरी ओर मुंबई का रहने वाला एक मुसलमान शख्स ऐसा भी है जो लाउडस्पीकर के खिलाफ लंबी कानूनी लड़ाई लड़ रहा है।
 जी हां, एनडीटीवी को दिए इंटरव्यू में मुंबई के रहने वाले मोहम्मद अली उर्फ बाबूभाई ने बताया कि लाउडस्पीकर के खिलाफ 20 साल से कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं।  बाबूबाई की उम्र 66 साल है, जो कि एक नवाजी मुसलमान हैं। बाबूभाई का कहना है कि लाउडस्पीकर से दी गई अजान गैरस्लामिक है। उन्होंने कहा कि लाउडस्पीकर 100 साल से आया है, जबकि इस्लाम धर्म 1400 साल पुराना है, जो कि मुकम्मल है।
बाबूभाई लाउडस्पीकर का खुलकर विरोध करते हैं। उन्होंने लाउडस्पीकर पर दी गई अजान को बंद कराने के लिए हाईकोर्ट में पिटीशन भी दायर की थी, लेकिन उनके पास कम पैसे थे, लिहाजा इस वजह से उन्होंने इस मामले पर खुद ही पैरवी की। बकौल बाबूभाई लाउडस्पीकर का प्रयोग किया जाना धर्म का हिस्सा नहीं है और न ही इसे हटाने से धर्म पर किसी तरह का खतरा है। उन्होंने कहा कि धर्म लगड़ा नहीं है, जिसे बैसाखी देकर ताकतवर बनाया जाए। बाबू ने इस लड़ाई को जारी रखने के लिए धर्मग्रंथ के साथ मौलवियों के 64 फतवे भी खोज निकाले हैं। उन्होंने बताया कि उनकी लड़ाई धर्म के खिलाफ नहीं बल्कि धर्म के नाम पर डेली रूटीन में जोड़ी गई अतिरिक्त और गैरजरूरी बातों के खिलाफ हैं। धर्म पहले से ही बेहद मजबूत है, जिसकी बुनियाद को किसी लाउडस्पीकर की जरूरत नहीं है।
बाबूभाई ने अपनी बात रखने के लिए किसी सोशल मीडिया का सहारा न लेकर कानून पर भरोसा रखकर इसे आगे जारी रखा है। लिहाजा अब वे इस लड़ाई में जीत गए हैं, इसलिए ये फैसला भी देश में लागू हो चुका है। धर्मस्थलों पर बजते लाउडस्पीकर को लेकर सुनवाई के दौरान मुंबई हाईकोर्ट ने अगस्त 2016 में फैसला भी सुनाया था कि कहीं भी लाउडस्पीकर का इस्तेमाल रात दस से सुबह 6 के बीच करने वालों पर एक लाख रुपए तक का जुर्माना और पांच साल तक की जेल होगी। लेकिन वाबजूद इसके पूरे देश के धार्मिक स्थलों पर लाउड स्पीकर चलता है।
उन्होंने कुरान के हवाले से मुंबई के बेहराम पाड़ा और भारत नगर जैसे मुस्लिम बहुल इलाकों की सात मस्जिदों पर से सारे लाउडस्पीकर बंद करा दिए हैं। उनकी लड़ाई में साथ देने वालों को हिम्मत जुटाने में काफी समय लगा लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। स्थानीय मदनी मस्जिद के ट्रस्टी मोहम्मद नजर ने NDTV इंडिया को बताया कि उनकी मस्जिद में तीन स्पीकर लगे हुए थे। अब ये भी लाउडस्पीकर भी हटा लिए गए हैं।

Monday, 17 April 2017

आयुर्वेद नस्य चिकित्सा की आंशिक आधुनिक चोरी मात्र,

प्रतिदिन नाक में २ -२ बूँद गाय के घी या तिल या सरसों के तेल की डालना हमें बहुत सारे लाभ देता है .तेल या घी को लेट कर नाक में डाले और हल्का सा खिंच ले . ५ मिं लेते रहे .इसे प्रतिमर्श नस्य कहा जाता है .
आयुर्वेद में इसे लेने के १४ समय बताये गए है -सुबह उठने पर ,दंत धावन, व्यायाम, शरीरसंबंध, मलमूत्र त्याग, भोजन ,वमन , के बाद दिन में सो के उठने पर ,और शाम को . बाहर जाते समय नस्य लेने से प्रदुषण का असर नहीं होगा .
– रात में सोते समय नस्य लेने से वात रोगों में लाभ मिलता है ; विशेषकर तब जब हम तेज़ पंखे या एसी में सोये .
– थायरोइड
-स्मरण शक्ति ; इसलिए विद्यार्थियों के लिए लाभकारी
-बाल झडना और असमय सफ़ेद होना
-दांत के रोगों में जैसे दर्द ,सेंसिटिविटी , मसूड़ों की समस्या
– बेहतर केल्शियम एब्ज़ोर्प्शन
– लम्बाई बढाता है
– नाक की समस्याएँ पोलिप्स , छींकें आना , नाक बंद होना , सर्दी ज़ुकाम
– गला खराब होने पर
– कान की समस्याएँ
– स्नायु शिथिलता
– स्टेमिना बढाता है .
– अच्छी नींद
– सिरदर्द
– मानसिक तनाव
– नाक के माध्यम से दी गई दवाई का डेढ़ मिं में असर होता है . ये ब्रेन पर तुरंत असर करता है क्योंकि यहाँ ब्लड ब्रेन बेरियर नहीं होता .नाक ही ब्रेन का प्रवेश द्वार है .
– हिमोग्लोबिन बढ़ता है .
– रोगप्रतिरोधक शक्ति बढती है .
– हकलाहट में लाभ
– होर्मोनल असंतुलन को ठीक करता है .
– फेशियल पेरेलिसिस
– आँख फड़कना
– चोट जल्द भरना
– विद्यार्थियों में दिमागी शक्ति बढाने के लिए केसर, ज्येष्ठी मधु , अश्वगंधा , ब्राम्ही , शंखपुष्पी , शतावरी जैसी दवाइयों का अर्क अगर गाय के घी से दिया जाए तो कान और आँखों की शक्ति बढती है ; दिमाग की ग्राह्य क्षमता बढती है
– एक शोध में वेखंड ,जटामासी ,वाला आदि जड़ी बूटी युक्त अगरबत्ती जब रात्री में जलाई गयी तो स्मरण शक्ति में सुधार देखा गया .
– गर्दन में दर्द
– टोंसिल्स
– .कुछ विशेष परिस्थितियों में जैसे स्म्रुतिनाश या फिट्स के लिए वैद्य की सलाह से नस्य ले .
– नस्य ना लेने का समय —- वर्षा ऋतू में जब सूर्य ना हो ; गर्भवती या प्रसव के बाद ;बाल धोने के बाद ; भूक या प्यास लगने पर , बीमार पड़ने पर ;अजीर्ण होने पर ; आघात होने पर या बहुत थका हुआ होने पर ; अनुवासन बस्ती या विरेचन के बाद .
नस्य- नासिका द्वारा जो औषधि प्रयुक्त होती है, उसे नस्य कहते हैं।नस्य को गले तथा सिर के समस्त रोगों की उत्तम चिकित्सा

Tuesday, 14 March 2017

चार ऋण होते हैं,
पितृऋण सबसे भयानक असर देता है

मनुष्य जन्म लेता है तो कर्मानुसार उसकी मृत्यु तक कई तरह के ऋण, पाप और पुण्य उसका पीछा करते रहते हैं।
 हिन्दू शास्त्रों में कहा गया है कि तीन तरह के ऋण को चुकता कर देने से मनुष्य को बहुत से पाप और संकटों से छुटकारा मिल जाता है। हालांकि जो लोग इसमें विश्वास नहीं करते उनको भी जीवन के किसी मोड़ पर इसका भुगतान करना ही होगा। आखिर ये ऋण कौन से हैं, यह जानना जरूरी है।

ये तीन ऋण हैं:-
1.देव ऋण, 2. ऋषि ऋण और 3. पितृ ऋण। कहीं कहीं पर ब्रहमा के ऋण का उल्लेख भी मिलता है। इस तरह चार ऋण हो जाता हैं।
इन चार ऋणों को उतारना प्रत्येक हिन्दू का कर्तव्य होना चाहिए। यह जीवन और अगला जीवन सुधारना हो, तो इन ऋणों के महत्व को समझना जरूरी है। मनुष्य पशुओं से इसलिए अलग है, क्योंकि उसके पास नैतिकता, धर्म और विज्ञान की समझ है। जो व्यक्ति इनको नहीं मानता वह पशुवत है।
क्यों चुकता करना होता है यह ऋण?
तीन ऋण नहीं चुकता करने पर उत्पन्न होते हैं त्रिविध ताप अर्थात सांसारिक दुख, देवी दुख और कर्म के दुख। ऋणों को चुकता नहीं करने से उक्त प्रकार के दुख तो उत्पन्न होते ही हैं और इससे व्यक्ति के जीवन में पिता, पत्नी या पुत्र में से कोई एक सुख ही मिलता है या तीनों से वह वंचित रह जाता है। यदि व्यक्ति बहुत ज्यादा इन ऋणों से ग्रस्त है तो उसे पागलखाने, जेलखाने या दवाखाने में ही जीवन गुजारना होता है।
त्रिविध ताप क्या हैं ?
*सांसारिक दुख अर्थात आपको कोई भी जीव, प्रकृति, मनुष्य या शारीरिक-मानसिक रोग कष्ट देगा।
*दैवी दुख अर्थात आपको ऊपरी शक्तियों द्वारा कष्ट मिलेगा।
*कर्म का दुख अर्थात आपके पिछले जन्म के कर्म और इस जन्म के बुरे कर्म मिलकर आपका दुर्भाग्य बढ़ाएंगे।
इन सभी से मुक्ति के लिए ही ऋण का चुकता करना जरूरी है। ऋण का चुकता करने की शुरुआत ही संकटों से मुक्त होने की शुरुआत मानी गई है।
 1.देव ऋण : माना जाता है कि देव ऋण भगवान विष्णु का है। यह ऋण उत्तम चरित्र रखते हुए दान और यज्ञ करने से चुकता होता है। जो लोग धर्म का अपमान करते हैं या धर्म के बारे में भ्रम फैलाते या वेदों के विरुद्ध कार्य करते हैं, उनके ऊपर यह ऋण दुष्प्रभाव डालने वाला सिद्ध होता है।

खास उपाय : प्रतिदिन सुबह और शाम संध्यावंदन करें और विष्णु, कृष्ण और हनुमानजी में से किसी एक के मंत्र, चालीसा, पाठ या स्तोत्र का जप करें।  चंदन का तिलक लगाएं। उत्तम और सात्विक भोजन करें। किसी भी प्रकार से न  धर्म का अपमान सहें और न करें। हिन्दू हैं तो हिन्दू कर्म और स्वभाव के बनें।

2.ऋषि ऋण : यह ऋण भगवान शंकर का है। वेद, उपनिषद और गीता पढ़कर उसके ज्ञान को सभी में बांटने से ही यह ऋण चुकता हो सकता है। जो व्यक्ति ऐसा नहीं करता है उससे भगवान शिव और ऋषिगण सदा अप्रसन्न ही रहते हैं। इससे व्यक्ति का जीवन घोर संकट में घिरता जाता है। मृत्यु के बाद उसे किसी भी प्रकार की मदद नहीं मिलती।

खास उपाय : इस ऋण को चुकाने के लिए व्यक्ति को प्रतिमाह गीता का पाठ करना चाहिए। स्वायंभू साधुओं से दूर रहकर सत्संग में जाते रहना चाहिए। सभी तरह की बुराइयों को समझकर उसे दूर करने का  प्रयास करना चाहिए। अच्छे आचरण को अपनाना चाहिए। शरीर, मन और घर को जितना हो सके साफ और स्वच्छ रखना चाहिए।
कुछ विशेष दिनों में ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए। घी, केसर या चंदन का तिलक लगाना चाहिए। पीपल, बड़ और तुलसी में जल अर्पित करना चाहिए। एकादशी, प्रदोष और चतुर्थी का व्रत रखना चाहिए। चतुर्मास के प्रथम माह श्रावण सोमवार को पूरे माह व्रत रखना चाहिए।

3.पितृ ऋण : यह ऋण हमारे पूर्वजों का माना गया है। पितृ ऋण कई तरह का होता है। हमारे कर्मों का, आत्मा का, पिता का, भाई का, बहन का, मां का, पत्नी का, बेटी और बेटे का। स्वऋण या आत्म ऋण का अर्थ है कि जब जातक, पूर्व जन्म में नास्तिक और धर्म विरोधी काम करता है, तो अगले जन्म में, उस पर स्वऋण चढ़ता है। मातृ ऋण से कर्ज चढ़ता जाता है और घर की शांति भंग हो जाती है।
बहन के ऋण से व्यापार-नौकरी कभी भी स्थायी नहीं रहती। जीवन में संघर्ष इतना बढ़ जाता है कि जीने की इच्छा खत्म हो जाती है। भाई के ऋण से हर तरह की सफलता मिलने के बाद अचानक सब कुछ तबाह हो जाता है। 28 से 36 वर्ष की आयु के बीच तमाम तरह की तकलीफ झेलनी पड़ती है।
  खास उपाय : इस ऋण को उतारने के तीन उपाय- देश के धर्म अनुसार कुल परंपरा का पालन करना, पितृपक्ष में तर्पण और श्राद्ध करना और संतान उत्पन्न करके उसमें धार्मिक संस्कार डालना। प्रतिदिन हनुमान चालीसा पढ़ना, भृकुटी पर शुद्ध जल का तिलक लगाना, तेरस, चौदस, अमावस्या और पूर्णिमा के दिन गुड़-घी की धूप देना, घर के वास्तु को ठीक करना और शरीर के सभी छिद्रों को अच्छी रीति से प्रतिदिन साफ-सुधरा रखने से भी यह ऋण चुकता होता है।

4. ब्रह्मा ऋण : पितृ ऋण के अलावा एक ब्रह्मा ऋण भी होता है जिसे भी पितृ ऋण के अंर्तगत ही माना जा सकता है। ब्रम्हा ऋण वो ऋण है जो हम पर ब्रम्हा का कर्ज है। ब्रम्हाजी और उनके पुत्रों ने हमें बनाया तो किसी भी प्रकार के भेदवाव, छुआछूत, जाति आदि में विभाजित करके नहीं बनाया। विभाजित करके नहीं बनाया लेकिन पृथ्वी पर आने के बाद हमने उनके कुल को जातियों में बांट दिया। अपने ही भाइयों से विभाजित कर दिया। इसका परिणाम यह हुआ की हमें युद्ध, हिंसा और अशांति को भोगना पड़ा और पड़ रहा है।  
दूसरी ओर यह ऋण हमारे पूर्वजों, हमारे कुल, हमारे धर्म, हमारे वंश आदि से जुड़ा है। इस ऋण को पृथ्वी का ऋण भी कहते हैं, जो संतान द्वारा चुकाया जाता है। बहुत से लोग अपने धर्म, मातृभूमि या कुल को छोड़कर चले गए हैं। उनके पीछे यह दोष कई जन्मों तक पीछा करता रहता है। यदि कोई व्यक्ति अपने धर्म और कुल को छोड़कर गया है तो उसके कुल के अंत होने तक यह चलता रहता है, क्यों‍कि यह ऋण ब्रह्मा और उनके पुत्रों से जुड़ा हुआ है।
खास उपाय : ब्रह्मा ऋण से मुक्ति पाने के लिए हमें घृणा, छुआछूत, जातिवाद, प्रांतवाद इत्यादि की भावना से दूर रहकर यह समझना चाहिए कि भारत में रहने वाला प्रत्येक व्यक्ति ब्रह्मा की संतान हैं। उसके और मेरे पूर्वज एक ही हैं जिससे में घृणा करता हूं। हिन्दू हैं तो हिन्दू ही बनकर रहें। न तो आप सवर्ण हैं और न दलित। यह तो अंग्रेजों और राजनीतिज्ञों ने आपको बांट दिया है। प्रत्येक भारतीय हिन्दू है। ब्रह्मा के पुत्र और मानस पुत्रों के बारे में आप विस्तार से पढ़ेंगे तो आपको इसका ज्ञान हो जाएगा कि हमारे पूर्वज कौन हैं।

*वसीयत और नसीहत*

एक दौलतमंद इंसान ने अपने बेटे को वसीयत देते हुए कहा,

*"बेटा मेरे मरने के बाद मेरे पैरों में ये फटे हुऐ मोज़े (जुराबें) पहना देना, मेरी यह इक्छा जरूर पूरी करना ।*

पिता के मरते ही नहलाने के बाद, बेटे ने पंडितजी से पिता की आखरी इक्छा बताई ।

*पंडितजी ने कहा: हमारे धर्म में कुछ भी पहनाने की इज़ाज़त नही है ।*

पर बेटे की ज़िद थी कि पिता की आखरी इक्छ पूरी हो ।

बहस इतनी बढ़ गई की शहर के पंडितों को जमा किया गया, लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला ।

*इसी माहौल में एक व्यक्ति आया, और आकर बेटे के हाथ में पिता का लिखा हुअा खत दिया, जिस में पिता की नसीहत लिखी थी*

"मेरे प्यारे बेटे"

*देख रहे हो..? दौलत, बंगला, गाड़ी और बड़ी-बड़ी फैक्ट्री और फॉर्म हाउस के बाद भी, मैं एक फटा हुअा मोजा तक नहीं ले जा सकता ।*

*एक रोज़ तुम्हें भी मृत्यु आएगी, आगाह हो जाओ, तुम्हें भी एक सफ़ेद कपडे में ही जाना पड़ेगा ।*

*लिहाज़ा कोशिश करना,पैसों के लिए किसी को दुःख मत देना, ग़लत तरीक़े से पैसा ना कमाना, धन को धर्म के कार्य में ही लगाना ।*

*क्यूँकि अर्थी में सिर्फ तुम्हारे कर्म ही जाएंगे"।*

*इसको गोर से पढ़ो दोस्तों*

इन्सान फिर भी धन की लालसा नहीं छोड़ता, भाई को भाई नहीं समझता, इस धन के कारण भाई मां बाप सबको भूल जाता है अंधा हो जाता है ।।

Wednesday, 1 March 2017

भगवान ने भी अपना ही गीत गाया -

गीता के ७०० श्लोकों में धृतराष्ट्र केवल एक बार ही अपना मुंह खोलता है और वह भी संजय से इतना ही पूछता है कि मेरे और पांडवों के बेटे अब क्या कर रहे होंगे ? बस इतना कहने के बाद वह मात्र श्रोता है, संजय का I संजय भी पूरे ग्रन्थ में केवल ९ बार बोलता है, फिर वह भी श्रोता हो जाता है अर्जुन- कृष्ण की बातचीत का ,
अर्जुन भी सिर्फ २२ बार बोलता है केवल अपनी शंका समाधान के लिये , बाकी समय वह भी श्रोता है श्रीकृष्ण का I निरंतर बोलने वाले सिर्फ भगवान श्रीकृष्ण ही हैं, शायद इसलिए इसको गीता नाम दिया गया I कुछ अंग्रेज कवियों ने इसको Song of God कहा I
बात भी सही है , जो करेगा गायेगा भी I लेकिन श्रीकृष्ण ने अपनी डींग नहीं हांकी ,अर्जुन को कन्विंस करने की पूरी कोशिश की और पूरी तरह कामयाब हुए I बहुत कम लोगों को यह श्रेय मिलता है कि जिनके बताये रास्ते पर चलने वाले को सफलता मिलती है I हालांकि कृष्ण ने सभी जगह अपनी चलाई, दूसरों की बात केवल उनके मन रखने के लिए सुनी I
एक दिलचस्प बात यह है कि "महाभारत" की लड़ाई में कौरवों की हठधर्मिता एक बहाना मात्र थी वास्तविकता में श्रीकृष्ण इस बहाने दुष्टों का सफाया करना चाहते थे I श्री कृष्ण जो प्रत्यक्ष करते थे वह नहीं होता था बल्कि वह होता था जो वह चाहते थे I प्रत्यक्ष कर्म उनकी औपचारिकता थी I

गीता के पहले अध्याय में धृतराष्ट्र द्वारा पूछे गये एकमात्र प्रश्न का उत्तर संजय ने बड़ी ईमानदारी के साथ गीता के अंतिम श्लोक में दिया कि राजन ! तुम भला मानो या बुरा, लेकिन सच्चाई तो यह है कि -
यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थ धनुर्धरः I
तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम II-
जिसके पक्ष में श्रीकृष्ण होंगे और जहां धनुर्धारी अर्जुन होंगे, विजय उसी पक्ष की होगी I यह सिर्फ मेरी राय है बाकी तुम सोच लो I ठीक यही बात "महाभारत" के किसी दूसरे पर्व में शायद भीष्म पितामह ने कही कि- " भाई सारी रौनक तो वहीं है जहां श्रीकृष्ण हैं , इसलिए झूठे ख्वाब पालने की जरूरत नहीं, विजय उन्हीं की होगी जिसकी तरफ श्रीकृष्ण होंगे I -
यत्र धर्मो द्युति:कान्तिर्यत्र ह्री श्रीस्तथा मति:I
यतो धर्मः स्तत कृष्णो यतः कृष्णो स्ततो जयः II
जयोऽस्तु पाण्डुपुत्राणां येषां पक्षे जनार्दनः ।
यतः कृष्णस्ततो धर्मो यतो धर्मस्ततो जयः ॥

चलते चलते एक और महत्वपूर्ण तथ्य यह भी नोट करने लायक है कि संजय ने अपना निष्कर्ष गीता के अंतिम पांच श्लोकों में सुनाया और देखिये ! पांडव भी पांच ही तो थे I
Govind Prasad Bahuguna
मात्र पढ़ा लिखा होने से कोई ज्ञानी नहीं होता #जावेद जी ।

एषां न विद्या तपो न दानं ज्ञानं न शीलं गुणों न धर्मः
ते मर्त्यलोके भुविभारभूता मनुष्य रूपेण मृगश्चरंति।।

इसी दर्शन को आज कल wisdom के नाम से बुलाते हैं ।
ज्ञान का संग्रहित रूप ही विजडम कहलाता है ।इसके 6 आयाम होते हैं और हर आयाम का व्यक्ति के विजडम में एक सामान भागीदारी होती है :
(1) cognitive knowledge - ये आपके जीवन का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है। आपके कैरिअर के लिए, रोजी कमाने के लिए जो ज्ञान आप प्राप्त करते हैं उसे cognitive knowledge कहते हैं , जैसे डॉक्टर, इंजीनियर, वकील, पत्रकार, शिक्षक  IAS , PCS आदि ।
हमारे समाज का पूरा जोर मात्र इसी ज्ञान को प्राप्त करने पर है क्योंकि जीवन का आधार "अर्थ" प्राप्ति का यही साधन है ।
 wisdom के 6 facet में ये मात्र एक अंग है। लेकिन महत्वपूर्ण है । उदाहरण स्वरूप गांधी ने एक आंदोलन को दुबारा रिपीट नहीं किया। जब भी  नया आंदोलन शुरू किया नए तरीके से। दूसरी तरफ मिनी गांधी यानि अन्ना एक साल पहले सुपरहिट लेकिन हाल में फुस्स। क्योंकि ले दे के जंतर मंतर और भूख हड़ताल।
ये फर्क इसलिए हुवा कि दोनों के cognitive knowledge के स्तर में फर्क था।

दुर्भाग्य की बात ये है कि मात्र cognitive knowledge वाले लोग ही समाज और देश की नीतियां बना रहे है । बाकी 5 facet उनके व्यक्तित्व में कही स्थान ही नही रखते।

(2) Emotional Knowledge : ये भी बहुत महत्वपूर्ण है ।इसका अर्थ ये होता है कि आप कैसे अपनी बात को रखें कि लोगों को अपील करे। वाणी में चाशनी कैसे घोलें कि सामनेवाला मन्त्रमुग्ध हो जाय।
नेताओं में ये ज्ञान प्रचुरता से पाया जाता है ।
(नोट: लेकिन पता चलता है कि ज्ञानी भी हैं वाणी में अद्भुत मिठास भी है लेकिन चोर है ससुरा। क्योंकि शास्त्रों में लिखा है -
 "अति मधुरम् चौरस्य लक्षणम्"।
 या बाबा तुलसीदास ने लिखा "नवन नीच की अति दुखदायी",    तो फिर ? आगे देखें ।

(3) Moral Knowledge : आप के अंदर नीति और अनीति को समझने का विवेक होना चाहिए। नीर छीर विवेकी, कि गलत क्या है, सही क्या है ।
(नोट- आदमी ज्ञानी भी, मधुर वाणी भी हो, उचित अनुचित (आवांछकी) का ज्ञान भी हो लेकिन उसको देश समाज से सरोकार ही न हो तो ? सामने ही किसी स्त्री की लाज लूटी जा रही हो और उसकी परवाह ही न करे तो ? आगे देखें )

(4) Social Knowledge: समाज और देश उचित अनुचित के प्रति हमारा धर्म क्या है, इसका ज्ञान होना social knowledge कहलाता है ।
महाभारत में जब कृष्ण दुर्योधन को समझाते हैं कि ये धर्म और अधर्म का तुम्हे ज्ञान नहीं है क्या ?
तो दुर्योधन कहता है -
" जानामि धर्मः न च प्रवृत्तिः
जानामि अधर्मः न च निवृत्तिः ।"
तो समाज के प्रति आपका क्या धर्म है उसको पालन करने की प्रवृत्ति भी होना चाहिए।
(नोट - ज्ञानी भी हो, मृदुभाषी भी हो, नैतिक भी हो, समाज के प्रति दायित्व भी निभा रहा हो , लेकिन आने वाली पीढ़ियों की जरूरतें कैसे पूरी होंगी , इसका कोई विचार ही न हो तो ? आगे पढ़ें
(5) Ecological knowledge: प्रकृति की पूजा , उसका संरक्षण । जितने की आवश्यकता हो प्रकृति का उतना ही दोहन करे । प्रकृति के नजदीक रहे । प्राकृतिक जीवन जीने का प्रयास करे । इसी को sustainable development के नाम से जाना जाता है।
 भारत इस जीवनशैली का विश्वगुरु रहा है।
 और इन सबको धारण करने के लिए आपके अंदर चाहिए क्या ? आगे पढ़ें
(6) Spiritual Knowledge: इसको प्राप्त करने के लिए मस्तिस्क में Neural wi fi होना चाहिए ।विश्व में क्या हो रहा है ? उसको समझने की शक्ति  और इसको विकसित करने के लिए धर्म के दस लक्षण आपकी मदद करेंगे ।  पूजा पाठ उसका पूर्वपक्ष है ज्ञान कांड उसका उत्तरपक्ष।

एक प्रयास है विजडम को समझने का। आशा है कि आप लोग इसमें सुधार करेंगे अपना योगदान देकर।
त्रिभुवन सिंह

Sunday, 26 February 2017

वर्षों बाद किसी एक कवि ने दबे सच को फिर से उजागर करने की कोशिश की है !                                    आप सभी  साहित्य प्रेमी पाठकों के लिए कवि की मूल कविता नीचे विस्तार से लिखी गयी है !                                  
ये कविता आज सुबह से सोशल मीडिया पर भारी संख्या में share की जा        रही हैं !
          🙏🙏🇮🇳🙏🙏
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माना गांधी ने कष्ट सहे थे ,  
अपनी पूरी निष्ठा से ।
और भारत प्रख्यात हुआ है,
उनकी अमर प्रतिष्ठा से ॥

किन्तु अहिंसा सत्य कभी,
अपनों पर ही ठन जाता है ।
घी और शहद अमृत हैं पर ,
मिलकर के विष बन जाता है।

अपने सारे निर्णय हम पर,
थोप रहे थे गांधी जी ।
तुष्टिकरण के खूनी खंजर,
घोंप रहे थे गांधी जी ॥

महाक्रांति का हर नायक तो,
उनके लिए खिलौना था ।
उनके हठ के आगे,         जम्बूदीप भी बौना था ॥

इसीलिये भारत अखण्ड, अखण्ड भारत का दौर गया ।
भारत से पंजाब, सिंध,   रावलपिंडी,लाहौर गया ॥

तब जाकर के सफल हुए,      जालिम जिन्ना के मंसूबे ।
गांधी जी अपनी जिद में ,
 पूरे भारत को ले डूबे ॥

भारत के इतिहासकार,
थे चाटुकार दरबारों में ।
अपना सब कुछ बेच चुके थे,
नेहरू के परिवारों में ॥

भारत का सच लिख पाना,
था उनके बस की बात नहीं ।
वैसे भी सूरज को लिख पाना,
जुगनू की औकात नहीं ॥

आजादी का श्रेय नहीं है,    गांधी के आंदोलन को ।
इन यज्ञों का हव्य बनाया,
शेखर ने पिस्टल गन को ॥

जो जिन्ना जैसे राक्षस से,
मिलने जुलने जाते थे ।
जिनके कपड़े लन्दन, पेरिस,
दुबई में धुलने जाते थे ॥

कायरता का नशा दिया है,
गांधी के पैमाने ने ।
भारत को बर्बाद किया,    नेहरू के राजघराने ने ॥

हिन्दू अरमानों की जलती,
एक चिता थे गांधी जी ।
कौरव का साथ निभाने वाले,
भीष्म पिता थे गांधी जी ॥

अपनी शर्तों पर इरविन तक,
को भी झुकवा सकते थे ।
भगत सिंह की फांसी को,     दो पल में रुकवा सकते थे ।।

मन्दिर में पढ़कर कुरान,              वो विश्व विजेता बने रहे ।
ऐसा करके मुस्लिम जन,    मानस के नेता बने रहे ॥

एक नवल गौरव गढ़ने की,
हिम्मत तो करते बापू  ।
मस्जिद में गीता पढ़ने की,
 हिम्मत तो करते बापू  ॥

रेलों में, हिन्दू काट-काट कर,
भेज रहे थे पाकिस्तानी ।
टोपी के लिए दुखी थे वे,      पर चोटी की एक नहीं मानी ॥

मानों फूलों के प्रति ममता,
खतम हो गई माली में ।
गांधी जी दंगों में बैठे थे, छिपकर नोवा खाली में ॥

तीन दिवस में श्री राम का,
धीरज संयम टूट गया ।
सौवीं गाली सुन,
कान्हा का चक्र हाथ से छूट गया ॥

गांधी जी की पाक, परस्ती पर
जब भारत लाचार हुआ ।
तब जाकर नाथू,                  बापू वध को मज़बूर हुआ ॥

गये सभा में गांधी जी,           करने अंतिम प्रणाम ।
ऐसी गोली मारी गांधी को,
याद आ गए श्री राम ॥

मूक अहिंसा के कारण ही भारत का आँचल फट जाता ।
गांधी जीवित होते तो           फिर देश,  दुबारा बंट जाता ॥

थक गए हैं हम प्रखर सत्य की
अर्थी को ढोते ढोते ।
कितना अच्छा होता जो        नेता जी राष्ट्रपिता होते ॥

नाथू को फाँसी लटकाकर गांधी जो को न्याय मिला ।
और मेरी भारत माँ को       बंटवारे का अध्याय मिला ॥

लेकिन जब भी कोई भीष्म कौरव का साथ निभाएगा ।
तब तब कोई अर्जुन रण में
उन पर तीर चलाएगा ॥

अगर गोडसे की गोली        उतरी ना होती सीने में ।
तो हर हिन्दू पढ़ता नमाज ,
फिर मक्का और मदीने में ॥

भारत की बिखरी भूमि अब तलक समाहित नहीं हुई ।
नाथू की रखी अस्थि           अब तलक प्रवाहित नहीं हुई ॥

इससे पहले अस्थिकलश को सिंधु सागर की लहरें सींचे ।
पूरा पाक समाहित कर लो     इस भगवा झंडे के नीचें ॥
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🇮🇳

Friday, 6 January 2017

जिस तरह की भयावह घटनाये महिलाओ के साथ 31 दिसम्बर की रात को देश के कुछ शहरो मे हुयी है और पहले भी होती रही है, इस तरह की विकृत मानसिकता  तेजी से देश के कुछ युवाओ मे क्यो पनप रही है यह चिंतन का विषय है.
क्या ये युवा ही अकेले इसके लिए जिम्मेदार हैं या फिर सामाजिक अधोसंरचना मे हो रहे बदलाव इन युवाओ की विकृत मानसिकता के लिए जिम्मेदार है?
वर्तमान भौतिकतावादी युग में हम सब आधुनिकता के नाम पर बहुत तेजी से अंधी दौड़ में भाग रहे है और इसके दुष्परिणाम स्पष्ट रूप से परिलक्षित हो रहे हैं.
क्या मां बाप के अलावा चाचा चाची, ताई ताऊ, मामा मामी, मौसी मौसा, भुआ फूफा, दादा दादी और नाना नानी जैसे रिश्तो का बच्चो के जीवन में कोई असतित्व बचा है या मां बाप को ही ये सारी भूमिकाये निभाने की मजबूरी हो गयी है और कही वो अपने व्यस्त जीवन में इन जिम्मेदारियो की अनदेखी तो नहीं कर रहे हैं ?
क्या नौकरो , आया बाई और पैसे के भरोसे छोडकर बच्चो को सही संस्कार दिये जा सकते है यह एक गंभीर प्रश्न है जिसका उत्तर हर परिवार को खुद ही ढूंढना है, ढूढिये नही तो आप अपने बच्चो मे सभ्यता और संस्कार ढूढते रह जायेगे पर वो आपको मिलेगे नही क्योकि आपने उन्हे वो संस्कार दिये ही नहीं है.
अभी भी वक्त है जीवन की आपाधापी मे थोडा ठहरिये, अपने परिवार को समय दीजिये और अपने बच्चो मे ये भरोसा जगाइये कि उन्हे अगर कोई दुविधा है तो वह आपको बता सके और आप उन्हे सही रास्ता दिखा सके अन्यथा ईश्वर ही मालिक है