Tuesday, 14 March 2017

चार ऋण होते हैं,
पितृऋण सबसे भयानक असर देता है

मनुष्य जन्म लेता है तो कर्मानुसार उसकी मृत्यु तक कई तरह के ऋण, पाप और पुण्य उसका पीछा करते रहते हैं।
 हिन्दू शास्त्रों में कहा गया है कि तीन तरह के ऋण को चुकता कर देने से मनुष्य को बहुत से पाप और संकटों से छुटकारा मिल जाता है। हालांकि जो लोग इसमें विश्वास नहीं करते उनको भी जीवन के किसी मोड़ पर इसका भुगतान करना ही होगा। आखिर ये ऋण कौन से हैं, यह जानना जरूरी है।

ये तीन ऋण हैं:-
1.देव ऋण, 2. ऋषि ऋण और 3. पितृ ऋण। कहीं कहीं पर ब्रहमा के ऋण का उल्लेख भी मिलता है। इस तरह चार ऋण हो जाता हैं।
इन चार ऋणों को उतारना प्रत्येक हिन्दू का कर्तव्य होना चाहिए। यह जीवन और अगला जीवन सुधारना हो, तो इन ऋणों के महत्व को समझना जरूरी है। मनुष्य पशुओं से इसलिए अलग है, क्योंकि उसके पास नैतिकता, धर्म और विज्ञान की समझ है। जो व्यक्ति इनको नहीं मानता वह पशुवत है।
क्यों चुकता करना होता है यह ऋण?
तीन ऋण नहीं चुकता करने पर उत्पन्न होते हैं त्रिविध ताप अर्थात सांसारिक दुख, देवी दुख और कर्म के दुख। ऋणों को चुकता नहीं करने से उक्त प्रकार के दुख तो उत्पन्न होते ही हैं और इससे व्यक्ति के जीवन में पिता, पत्नी या पुत्र में से कोई एक सुख ही मिलता है या तीनों से वह वंचित रह जाता है। यदि व्यक्ति बहुत ज्यादा इन ऋणों से ग्रस्त है तो उसे पागलखाने, जेलखाने या दवाखाने में ही जीवन गुजारना होता है।
त्रिविध ताप क्या हैं ?
*सांसारिक दुख अर्थात आपको कोई भी जीव, प्रकृति, मनुष्य या शारीरिक-मानसिक रोग कष्ट देगा।
*दैवी दुख अर्थात आपको ऊपरी शक्तियों द्वारा कष्ट मिलेगा।
*कर्म का दुख अर्थात आपके पिछले जन्म के कर्म और इस जन्म के बुरे कर्म मिलकर आपका दुर्भाग्य बढ़ाएंगे।
इन सभी से मुक्ति के लिए ही ऋण का चुकता करना जरूरी है। ऋण का चुकता करने की शुरुआत ही संकटों से मुक्त होने की शुरुआत मानी गई है।
 1.देव ऋण : माना जाता है कि देव ऋण भगवान विष्णु का है। यह ऋण उत्तम चरित्र रखते हुए दान और यज्ञ करने से चुकता होता है। जो लोग धर्म का अपमान करते हैं या धर्म के बारे में भ्रम फैलाते या वेदों के विरुद्ध कार्य करते हैं, उनके ऊपर यह ऋण दुष्प्रभाव डालने वाला सिद्ध होता है।

खास उपाय : प्रतिदिन सुबह और शाम संध्यावंदन करें और विष्णु, कृष्ण और हनुमानजी में से किसी एक के मंत्र, चालीसा, पाठ या स्तोत्र का जप करें।  चंदन का तिलक लगाएं। उत्तम और सात्विक भोजन करें। किसी भी प्रकार से न  धर्म का अपमान सहें और न करें। हिन्दू हैं तो हिन्दू कर्म और स्वभाव के बनें।

2.ऋषि ऋण : यह ऋण भगवान शंकर का है। वेद, उपनिषद और गीता पढ़कर उसके ज्ञान को सभी में बांटने से ही यह ऋण चुकता हो सकता है। जो व्यक्ति ऐसा नहीं करता है उससे भगवान शिव और ऋषिगण सदा अप्रसन्न ही रहते हैं। इससे व्यक्ति का जीवन घोर संकट में घिरता जाता है। मृत्यु के बाद उसे किसी भी प्रकार की मदद नहीं मिलती।

खास उपाय : इस ऋण को चुकाने के लिए व्यक्ति को प्रतिमाह गीता का पाठ करना चाहिए। स्वायंभू साधुओं से दूर रहकर सत्संग में जाते रहना चाहिए। सभी तरह की बुराइयों को समझकर उसे दूर करने का  प्रयास करना चाहिए। अच्छे आचरण को अपनाना चाहिए। शरीर, मन और घर को जितना हो सके साफ और स्वच्छ रखना चाहिए।
कुछ विशेष दिनों में ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए। घी, केसर या चंदन का तिलक लगाना चाहिए। पीपल, बड़ और तुलसी में जल अर्पित करना चाहिए। एकादशी, प्रदोष और चतुर्थी का व्रत रखना चाहिए। चतुर्मास के प्रथम माह श्रावण सोमवार को पूरे माह व्रत रखना चाहिए।

3.पितृ ऋण : यह ऋण हमारे पूर्वजों का माना गया है। पितृ ऋण कई तरह का होता है। हमारे कर्मों का, आत्मा का, पिता का, भाई का, बहन का, मां का, पत्नी का, बेटी और बेटे का। स्वऋण या आत्म ऋण का अर्थ है कि जब जातक, पूर्व जन्म में नास्तिक और धर्म विरोधी काम करता है, तो अगले जन्म में, उस पर स्वऋण चढ़ता है। मातृ ऋण से कर्ज चढ़ता जाता है और घर की शांति भंग हो जाती है।
बहन के ऋण से व्यापार-नौकरी कभी भी स्थायी नहीं रहती। जीवन में संघर्ष इतना बढ़ जाता है कि जीने की इच्छा खत्म हो जाती है। भाई के ऋण से हर तरह की सफलता मिलने के बाद अचानक सब कुछ तबाह हो जाता है। 28 से 36 वर्ष की आयु के बीच तमाम तरह की तकलीफ झेलनी पड़ती है।
  खास उपाय : इस ऋण को उतारने के तीन उपाय- देश के धर्म अनुसार कुल परंपरा का पालन करना, पितृपक्ष में तर्पण और श्राद्ध करना और संतान उत्पन्न करके उसमें धार्मिक संस्कार डालना। प्रतिदिन हनुमान चालीसा पढ़ना, भृकुटी पर शुद्ध जल का तिलक लगाना, तेरस, चौदस, अमावस्या और पूर्णिमा के दिन गुड़-घी की धूप देना, घर के वास्तु को ठीक करना और शरीर के सभी छिद्रों को अच्छी रीति से प्रतिदिन साफ-सुधरा रखने से भी यह ऋण चुकता होता है।

4. ब्रह्मा ऋण : पितृ ऋण के अलावा एक ब्रह्मा ऋण भी होता है जिसे भी पितृ ऋण के अंर्तगत ही माना जा सकता है। ब्रम्हा ऋण वो ऋण है जो हम पर ब्रम्हा का कर्ज है। ब्रम्हाजी और उनके पुत्रों ने हमें बनाया तो किसी भी प्रकार के भेदवाव, छुआछूत, जाति आदि में विभाजित करके नहीं बनाया। विभाजित करके नहीं बनाया लेकिन पृथ्वी पर आने के बाद हमने उनके कुल को जातियों में बांट दिया। अपने ही भाइयों से विभाजित कर दिया। इसका परिणाम यह हुआ की हमें युद्ध, हिंसा और अशांति को भोगना पड़ा और पड़ रहा है।  
दूसरी ओर यह ऋण हमारे पूर्वजों, हमारे कुल, हमारे धर्म, हमारे वंश आदि से जुड़ा है। इस ऋण को पृथ्वी का ऋण भी कहते हैं, जो संतान द्वारा चुकाया जाता है। बहुत से लोग अपने धर्म, मातृभूमि या कुल को छोड़कर चले गए हैं। उनके पीछे यह दोष कई जन्मों तक पीछा करता रहता है। यदि कोई व्यक्ति अपने धर्म और कुल को छोड़कर गया है तो उसके कुल के अंत होने तक यह चलता रहता है, क्यों‍कि यह ऋण ब्रह्मा और उनके पुत्रों से जुड़ा हुआ है।
खास उपाय : ब्रह्मा ऋण से मुक्ति पाने के लिए हमें घृणा, छुआछूत, जातिवाद, प्रांतवाद इत्यादि की भावना से दूर रहकर यह समझना चाहिए कि भारत में रहने वाला प्रत्येक व्यक्ति ब्रह्मा की संतान हैं। उसके और मेरे पूर्वज एक ही हैं जिससे में घृणा करता हूं। हिन्दू हैं तो हिन्दू ही बनकर रहें। न तो आप सवर्ण हैं और न दलित। यह तो अंग्रेजों और राजनीतिज्ञों ने आपको बांट दिया है। प्रत्येक भारतीय हिन्दू है। ब्रह्मा के पुत्र और मानस पुत्रों के बारे में आप विस्तार से पढ़ेंगे तो आपको इसका ज्ञान हो जाएगा कि हमारे पूर्वज कौन हैं।

*वसीयत और नसीहत*

एक दौलतमंद इंसान ने अपने बेटे को वसीयत देते हुए कहा,

*"बेटा मेरे मरने के बाद मेरे पैरों में ये फटे हुऐ मोज़े (जुराबें) पहना देना, मेरी यह इक्छा जरूर पूरी करना ।*

पिता के मरते ही नहलाने के बाद, बेटे ने पंडितजी से पिता की आखरी इक्छा बताई ।

*पंडितजी ने कहा: हमारे धर्म में कुछ भी पहनाने की इज़ाज़त नही है ।*

पर बेटे की ज़िद थी कि पिता की आखरी इक्छ पूरी हो ।

बहस इतनी बढ़ गई की शहर के पंडितों को जमा किया गया, लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला ।

*इसी माहौल में एक व्यक्ति आया, और आकर बेटे के हाथ में पिता का लिखा हुअा खत दिया, जिस में पिता की नसीहत लिखी थी*

"मेरे प्यारे बेटे"

*देख रहे हो..? दौलत, बंगला, गाड़ी और बड़ी-बड़ी फैक्ट्री और फॉर्म हाउस के बाद भी, मैं एक फटा हुअा मोजा तक नहीं ले जा सकता ।*

*एक रोज़ तुम्हें भी मृत्यु आएगी, आगाह हो जाओ, तुम्हें भी एक सफ़ेद कपडे में ही जाना पड़ेगा ।*

*लिहाज़ा कोशिश करना,पैसों के लिए किसी को दुःख मत देना, ग़लत तरीक़े से पैसा ना कमाना, धन को धर्म के कार्य में ही लगाना ।*

*क्यूँकि अर्थी में सिर्फ तुम्हारे कर्म ही जाएंगे"।*

*इसको गोर से पढ़ो दोस्तों*

इन्सान फिर भी धन की लालसा नहीं छोड़ता, भाई को भाई नहीं समझता, इस धन के कारण भाई मां बाप सबको भूल जाता है अंधा हो जाता है ।।

Wednesday, 1 March 2017

भगवान ने भी अपना ही गीत गाया -

गीता के ७०० श्लोकों में धृतराष्ट्र केवल एक बार ही अपना मुंह खोलता है और वह भी संजय से इतना ही पूछता है कि मेरे और पांडवों के बेटे अब क्या कर रहे होंगे ? बस इतना कहने के बाद वह मात्र श्रोता है, संजय का I संजय भी पूरे ग्रन्थ में केवल ९ बार बोलता है, फिर वह भी श्रोता हो जाता है अर्जुन- कृष्ण की बातचीत का ,
अर्जुन भी सिर्फ २२ बार बोलता है केवल अपनी शंका समाधान के लिये , बाकी समय वह भी श्रोता है श्रीकृष्ण का I निरंतर बोलने वाले सिर्फ भगवान श्रीकृष्ण ही हैं, शायद इसलिए इसको गीता नाम दिया गया I कुछ अंग्रेज कवियों ने इसको Song of God कहा I
बात भी सही है , जो करेगा गायेगा भी I लेकिन श्रीकृष्ण ने अपनी डींग नहीं हांकी ,अर्जुन को कन्विंस करने की पूरी कोशिश की और पूरी तरह कामयाब हुए I बहुत कम लोगों को यह श्रेय मिलता है कि जिनके बताये रास्ते पर चलने वाले को सफलता मिलती है I हालांकि कृष्ण ने सभी जगह अपनी चलाई, दूसरों की बात केवल उनके मन रखने के लिए सुनी I
एक दिलचस्प बात यह है कि "महाभारत" की लड़ाई में कौरवों की हठधर्मिता एक बहाना मात्र थी वास्तविकता में श्रीकृष्ण इस बहाने दुष्टों का सफाया करना चाहते थे I श्री कृष्ण जो प्रत्यक्ष करते थे वह नहीं होता था बल्कि वह होता था जो वह चाहते थे I प्रत्यक्ष कर्म उनकी औपचारिकता थी I

गीता के पहले अध्याय में धृतराष्ट्र द्वारा पूछे गये एकमात्र प्रश्न का उत्तर संजय ने बड़ी ईमानदारी के साथ गीता के अंतिम श्लोक में दिया कि राजन ! तुम भला मानो या बुरा, लेकिन सच्चाई तो यह है कि -
यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थ धनुर्धरः I
तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम II-
जिसके पक्ष में श्रीकृष्ण होंगे और जहां धनुर्धारी अर्जुन होंगे, विजय उसी पक्ष की होगी I यह सिर्फ मेरी राय है बाकी तुम सोच लो I ठीक यही बात "महाभारत" के किसी दूसरे पर्व में शायद भीष्म पितामह ने कही कि- " भाई सारी रौनक तो वहीं है जहां श्रीकृष्ण हैं , इसलिए झूठे ख्वाब पालने की जरूरत नहीं, विजय उन्हीं की होगी जिसकी तरफ श्रीकृष्ण होंगे I -
यत्र धर्मो द्युति:कान्तिर्यत्र ह्री श्रीस्तथा मति:I
यतो धर्मः स्तत कृष्णो यतः कृष्णो स्ततो जयः II
जयोऽस्तु पाण्डुपुत्राणां येषां पक्षे जनार्दनः ।
यतः कृष्णस्ततो धर्मो यतो धर्मस्ततो जयः ॥

चलते चलते एक और महत्वपूर्ण तथ्य यह भी नोट करने लायक है कि संजय ने अपना निष्कर्ष गीता के अंतिम पांच श्लोकों में सुनाया और देखिये ! पांडव भी पांच ही तो थे I
Govind Prasad Bahuguna
मात्र पढ़ा लिखा होने से कोई ज्ञानी नहीं होता #जावेद जी ।

एषां न विद्या तपो न दानं ज्ञानं न शीलं गुणों न धर्मः
ते मर्त्यलोके भुविभारभूता मनुष्य रूपेण मृगश्चरंति।।

इसी दर्शन को आज कल wisdom के नाम से बुलाते हैं ।
ज्ञान का संग्रहित रूप ही विजडम कहलाता है ।इसके 6 आयाम होते हैं और हर आयाम का व्यक्ति के विजडम में एक सामान भागीदारी होती है :
(1) cognitive knowledge - ये आपके जीवन का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है। आपके कैरिअर के लिए, रोजी कमाने के लिए जो ज्ञान आप प्राप्त करते हैं उसे cognitive knowledge कहते हैं , जैसे डॉक्टर, इंजीनियर, वकील, पत्रकार, शिक्षक  IAS , PCS आदि ।
हमारे समाज का पूरा जोर मात्र इसी ज्ञान को प्राप्त करने पर है क्योंकि जीवन का आधार "अर्थ" प्राप्ति का यही साधन है ।
 wisdom के 6 facet में ये मात्र एक अंग है। लेकिन महत्वपूर्ण है । उदाहरण स्वरूप गांधी ने एक आंदोलन को दुबारा रिपीट नहीं किया। जब भी  नया आंदोलन शुरू किया नए तरीके से। दूसरी तरफ मिनी गांधी यानि अन्ना एक साल पहले सुपरहिट लेकिन हाल में फुस्स। क्योंकि ले दे के जंतर मंतर और भूख हड़ताल।
ये फर्क इसलिए हुवा कि दोनों के cognitive knowledge के स्तर में फर्क था।

दुर्भाग्य की बात ये है कि मात्र cognitive knowledge वाले लोग ही समाज और देश की नीतियां बना रहे है । बाकी 5 facet उनके व्यक्तित्व में कही स्थान ही नही रखते।

(2) Emotional Knowledge : ये भी बहुत महत्वपूर्ण है ।इसका अर्थ ये होता है कि आप कैसे अपनी बात को रखें कि लोगों को अपील करे। वाणी में चाशनी कैसे घोलें कि सामनेवाला मन्त्रमुग्ध हो जाय।
नेताओं में ये ज्ञान प्रचुरता से पाया जाता है ।
(नोट: लेकिन पता चलता है कि ज्ञानी भी हैं वाणी में अद्भुत मिठास भी है लेकिन चोर है ससुरा। क्योंकि शास्त्रों में लिखा है -
 "अति मधुरम् चौरस्य लक्षणम्"।
 या बाबा तुलसीदास ने लिखा "नवन नीच की अति दुखदायी",    तो फिर ? आगे देखें ।

(3) Moral Knowledge : आप के अंदर नीति और अनीति को समझने का विवेक होना चाहिए। नीर छीर विवेकी, कि गलत क्या है, सही क्या है ।
(नोट- आदमी ज्ञानी भी, मधुर वाणी भी हो, उचित अनुचित (आवांछकी) का ज्ञान भी हो लेकिन उसको देश समाज से सरोकार ही न हो तो ? सामने ही किसी स्त्री की लाज लूटी जा रही हो और उसकी परवाह ही न करे तो ? आगे देखें )

(4) Social Knowledge: समाज और देश उचित अनुचित के प्रति हमारा धर्म क्या है, इसका ज्ञान होना social knowledge कहलाता है ।
महाभारत में जब कृष्ण दुर्योधन को समझाते हैं कि ये धर्म और अधर्म का तुम्हे ज्ञान नहीं है क्या ?
तो दुर्योधन कहता है -
" जानामि धर्मः न च प्रवृत्तिः
जानामि अधर्मः न च निवृत्तिः ।"
तो समाज के प्रति आपका क्या धर्म है उसको पालन करने की प्रवृत्ति भी होना चाहिए।
(नोट - ज्ञानी भी हो, मृदुभाषी भी हो, नैतिक भी हो, समाज के प्रति दायित्व भी निभा रहा हो , लेकिन आने वाली पीढ़ियों की जरूरतें कैसे पूरी होंगी , इसका कोई विचार ही न हो तो ? आगे पढ़ें
(5) Ecological knowledge: प्रकृति की पूजा , उसका संरक्षण । जितने की आवश्यकता हो प्रकृति का उतना ही दोहन करे । प्रकृति के नजदीक रहे । प्राकृतिक जीवन जीने का प्रयास करे । इसी को sustainable development के नाम से जाना जाता है।
 भारत इस जीवनशैली का विश्वगुरु रहा है।
 और इन सबको धारण करने के लिए आपके अंदर चाहिए क्या ? आगे पढ़ें
(6) Spiritual Knowledge: इसको प्राप्त करने के लिए मस्तिस्क में Neural wi fi होना चाहिए ।विश्व में क्या हो रहा है ? उसको समझने की शक्ति  और इसको विकसित करने के लिए धर्म के दस लक्षण आपकी मदद करेंगे ।  पूजा पाठ उसका पूर्वपक्ष है ज्ञान कांड उसका उत्तरपक्ष।

एक प्रयास है विजडम को समझने का। आशा है कि आप लोग इसमें सुधार करेंगे अपना योगदान देकर।
त्रिभुवन सिंह