Friday, 6 January 2017

जिस तरह की भयावह घटनाये महिलाओ के साथ 31 दिसम्बर की रात को देश के कुछ शहरो मे हुयी है और पहले भी होती रही है, इस तरह की विकृत मानसिकता  तेजी से देश के कुछ युवाओ मे क्यो पनप रही है यह चिंतन का विषय है.
क्या ये युवा ही अकेले इसके लिए जिम्मेदार हैं या फिर सामाजिक अधोसंरचना मे हो रहे बदलाव इन युवाओ की विकृत मानसिकता के लिए जिम्मेदार है?
वर्तमान भौतिकतावादी युग में हम सब आधुनिकता के नाम पर बहुत तेजी से अंधी दौड़ में भाग रहे है और इसके दुष्परिणाम स्पष्ट रूप से परिलक्षित हो रहे हैं.
क्या मां बाप के अलावा चाचा चाची, ताई ताऊ, मामा मामी, मौसी मौसा, भुआ फूफा, दादा दादी और नाना नानी जैसे रिश्तो का बच्चो के जीवन में कोई असतित्व बचा है या मां बाप को ही ये सारी भूमिकाये निभाने की मजबूरी हो गयी है और कही वो अपने व्यस्त जीवन में इन जिम्मेदारियो की अनदेखी तो नहीं कर रहे हैं ?
क्या नौकरो , आया बाई और पैसे के भरोसे छोडकर बच्चो को सही संस्कार दिये जा सकते है यह एक गंभीर प्रश्न है जिसका उत्तर हर परिवार को खुद ही ढूंढना है, ढूढिये नही तो आप अपने बच्चो मे सभ्यता और संस्कार ढूढते रह जायेगे पर वो आपको मिलेगे नही क्योकि आपने उन्हे वो संस्कार दिये ही नहीं है.
अभी भी वक्त है जीवन की आपाधापी मे थोडा ठहरिये, अपने परिवार को समय दीजिये और अपने बच्चो मे ये भरोसा जगाइये कि उन्हे अगर कोई दुविधा है तो वह आपको बता सके और आप उन्हे सही रास्ता दिखा सके अन्यथा ईश्वर ही मालिक है