Wednesday, 30 March 2016

कन्हैया भी हार्दिक पटेल का ही प्रतिरूप है, क्यूंकि हार्दिक पटेल भी राजनितिक साजिश का मोहरा था इसीलिए उसका आंदोलन ताश के पत्तो की तरह ढह गया चूँकि यह बात सबके सामने खुल कर आ गई थी कि कुछ राजनितिक हार्दिक को मोहरा बना कर उसके कंधे पर रखकर बंदूक से मोदीजी को निशाना बनाना चाहते थे,अब यही बात कन्हैया के मामले में सिद्ध हो रही है कि कन्हैया की बुद्धि तो बहुत सीमित है और उसका राजनीतिज्ञ ज्ञान बहुत ही निचले स्तर का है यह इससे ही सिद्ध हो जाता है कि कन्हैया लाल फरमाते है कि १९८४ में हुआ सिखों का सामूहिक कत्लेआम ना तो तत्कालीन सरकार द्वारा प्रायोजित था और ना ही राजनीतिज्ञों द्वारा कत्लेआम के लिए उकसाया था लेकिन गुजरात दंगा तत्कालीन सरकार द्वारा प्रायोजित था, मतलब कन्हैया भी अब कुछ राजनितिक दलों का मोहरा बनकर रह गया है और जल्द ही गीला पटाखा सिद्ध हो कर पटल से जल्द लुप्त हो जाएगा। ये तो होना ही था क्यूंकि जो आदमी जेएनयू केम्पस में लड़कियां के सामने बेशर्मी से मूतता है और लड़कियों को धमकी देता है कि वह बार बार ऐसा करेगा और उसके लिए दण्डित भी होता है उसके मानसिक स्तर का हम सब आसानी से अंदाज़ लगा सकते है इसलिए वामपंथियों और वामपंथी मानसिकता के पत्रकारों राजदीप,बरखा,सागरिका,शेखर गुप्ता,पुण्य प्रसून,अभिज्ञान,अभिसार, रविश तुम लोग मातम मनाना शुरू क्र दो क्यूंकि तुम लोगो के द्वारा मोदीजी के खिलाफ खड़ा किया हीरो तो जोकर भी नहीं निकला,क्यूंकि जोकर की भी तश के पत्तो में अहमियत होती है 

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