Sunday, 6 March 2016

आज मै जिस विषय पर चर्चा छेड़ना चाहता हूँ वह बड़ा ही संवेदनशील और चिंतन का विषय है, वर्तमान में भौतिकतावाद इतना हावी हो गया है कि माँ बाप अपने बच्चो पर अपनी महत्वाकांक्षाएं इस हद तक थोपने लगे है कि बच्चे उस बोझ का दबाब झेलने में खुद को असमर्थ पा रहे है और उसका नतीजा यह है कि बच्चे अब आत्महत्या जैसा कदम भी उठाने लगे है. हाल ही में मध्यप्रदेश के विभिन्न स्थानो पर दसवी कक्षा के चार बच्चो ने आत्महत्या कर ली क्यों ? क्यूंकि उनपर बेहतर करने का दबाब था।  क्या हमें बच्चो के ऊपर इतना दबाब डालना चाहिए ?  क्या परीक्षाओ में ऊँचे प्रतिशत से पास होना ही जीवन में सफलता का मापदण्ड बन गया है ? हर बच्चे की अपनी अपनी शारीरिक या मानसिक क्षमताये होती है उन्हें अच्छे प्रदर्शन के लिए प्रोत्साहित कीजिये पर उन पर अपनी महत्वाकांक्षाएं मत थोपिये। उनकी भी इच्छाओ रूचि और अभिव्यक्ति का भी सम्मान करिये उन पर अपने सपने मत थोपिये नही तो ऐसे हादसे पुरे देश में और बढ़ेंगे। विकसित होते युवाओ पर इतना दबाब मत डालो उन्हें भी आकाश में खुला उड़ने की आज़ादी दो उन्हें अपनी महत्वाकांक्षाओं रूपी पिंजरे में कैद मत करो,बनाना ही है तो बच्चो को सबसे पहले अच्छा इंसान बनाइये अपनी मंज़िल तो वो खुद ही तय कर लेंगे जय हिन्द 

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