Tuesday, 19 January 2016

कश्मीरी पंडितो पर हुए अत्याचार असहिषुण्ता क्यों नही ?
१९४७ में कश्मीरी पंडित कश्मीर की कुल आबादी का १५% थे, जो १९८१ तक घटकर ५% रह गए और १९८५ से कश्मीरी पंडितो पर अत्याचार और बढ़ गए, ४ जनवरी १९९० से मस्जिदो से लाउडस्पीकर पर घोषणाएं होने लगी थी कि कश्मीरी पंडितो कश्मीर छोड़ो, आतंकी संगठन हिज्बुल मुजाहदीन ने स्थानीय उर्दू अखबारों में प्रेस रिलीज छपवायी कि " कश्मीरी पंडितो या तो मुस्लमान बनो या कश्मीर छोड़ो, हद  गयी जब इस तरह के नारे लाउडस्पीकर से गूंजने लगे कि कश्मीरी पंडित तो कश्मीर छोड़ेंगे पर महिलाये यही पर रहेंगी सोचिये क्या गुजरी होगी उस वक्त कश्मीरी पंडितो के दिलो पर, १९९० में कश्मीरी पंडितो की दुकानो और फैक्टरियों को जलाने की १४४३० घटनाये हुयी, इनके ९५% से अधिक घर जला दिए गए, ११०० से अधिक कश्मीरी पंडितो की निर्ममता से हत्या कर दी गयी, और हम तो सिर्फ कल्पना भर कर सकते है कि कैसे भयभीत और डरी हुयी अवस्था में कश्मीरी पंडित अपने घरो से बेघर हुए होंगे, १९९६-९७ तक तो किसी ने भी कश्मीरी पंडितो की सुध नही ली, फिर जम्मू में दो कमरो के ५२४२ घर बनवाए गए जिनमे १७२४८ कश्मीरी पंडित परिवार रह रहे है मतलब एक घर में २ से ३ परिवार, इन्हे १६०० रूपये प्रति माह मदद दी जाती है, जी हाँ सिर्फ १६०० रुपये प्रति माह प्रति परिवार, जम्मू के शिविरो में रहने वाले कश्मीरी पंडितो की संख्या १.८ लाख है जिनके पास मुलभूत सुविधाये भी उपलब्ध नही है शिविरो में बिजली १६-१८ घंटे नही रहती है , कश्मीर से पलायन करने वाले कश्मीरी पंडितो में से २३,७८० कश्मीरी पंडितो की मृत्यु हो चुकी है,आज ककश्मीरी पंडित युवा शादी करने से कतरा रहे है, २००३ में लश्करे तैय्यबा ने पुलवामा जिले के नादीमर्ग में आतंकवादी हमला कर २४ कश्मीरी पंडितो की हत्या कर दी थी, और आज भी कश्मीरी पंडितो का ना तो ठीक ढंग से पुनर्वासन किया गया है और ना ही वो अपने घर लौट सकते है, हद तो तब हो गयी जब एक न्यूज़ चैनल के प्रोग्राम में पी डी पी के इंजीनियर रशीद फरमाते है कि कश्मीरी पंडितो को राहत पैकेज मिल तो रहा है और क्या चाहिए, पिछले २६ सालो से कश्मीरी पंडित अपने घर से निर्वासित है बुरे हालातो में जी रहे है पर कोई साहित्यकार, बुद्धिजीवी,फिल्म निर्देशक,अभिनेता, गायक ना तो अवार्ड वापसी कर रहा है और ना इनके पक्ष में बोलने को तैयार है, थू है ऐसे लोगो पर, क्या ये असहिषुण्ता नही है क्या इनके लिए कोई इसलिए आवाज़ नही उठा रहा है कि वो हिन्दू है क्या कश्मीरी पंडितो के मानव अधिकार नही है क्या इन्हे आज़ादी से और खुशहाल जिंदगी जीने का हक नही है तो फिर इन तथाकथित धर्मनिरपेक्षियो की चुप्पी क्यों ? क्या ये दोगलापन नही है ? सोचिये ? जयहिंद       

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